अदालत में इंतेजार मेहंदी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक शंकर तिवारी व शादाब अहमद ने पक्ष रखा।
वाराणसी। जनपद के अपर जिलाधिकारी नगर आलोक कुमार वर्मा की अदालत के द्वारा बेदखली व कब्जा बहाली से सम्बन्धित मामले में एक वाद संख्या 979/2024 रमेन्द्र कुमार बनाम इंतेजार मेहंदी में एक अहम फैसला सुनाया गया। वहीं अदालत में इंतेजार मेहंदी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक शंकर तिवारी व शादाब अहमद ने पक्ष रखा। उक्त के सम्बन्ध में बताते चले कि प्रस्तुत वाद की कार्यवाही रमेन्द्र कुमार पुत्र स्व० बद्री प्रसाद निवासी- म०नं० सी० 1/26ए मोहल्ला फाटक शेख सलीम नई सड़क वाराणसी द्वारा अन्तर्गत धारा 21 (2) उ०प्र० नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम-2021, मकान नम्बर सी० 1/26ए मोहल्ला फाटक शेख सलीम नई सड़क वाराणसी स्थित दुकान से किरायेदार इंतजार मेंहदी के बेदखली, वसूली किराया व कब्जा बहाली हेतु प्रस्तुत प्रपत्र-7/प्रार्थना पत्र दिनांक 21.03.2024 पर प्रारम्भ हुयी है।
वादी द्वारा अपने वादपत्र में मुख्यतः अभिकथन किया गया है कि आवेदक विवादित भवन म०नं० सी० 1/26ए स्थित मोहल्ला फाटक शेख सलीम नई सड़क हल्का चेतगंज वाराणसी का स्वामी है और बतौर स्वामी काबिज दखील रहते हुए भवन सम्पति का उपयोग व उपभोग करते हुए सरकारी करों का अनुदान करता चला आ रहा है। वादित सम्पत्ति/किरायेदारी की दुकान जो उक्त भवन में भूतल में स्थित है को करीब 17 वर्ष पूर्व विपक्षी द्वारा अपने व्यवसाय करने वास्ते 400/- रूपये माहवारी किराये पर प्राप्त करने वास्ते आवेदक के स्वर्गीय पिता से निवेदन किया गया। आवेदक के पिता अपनी आर्थिक परेशानियों के कारण विपक्षी/किरायेदार को 400/- रूपये महावार वादित सम्पत्ति/दुकान को किराये पर देने को तैयार व रजामंद हुए और किरायेदारी दिनांक 7. 2.2004 को लिखित नोटरीयल तहरीर करायी और उसमें हर पांच वर्ष पर किरायेदारी की दर में 25 प्रतिशत की वृद्धि की शर्त भी रही। उक्त किरायेदारी पत्र इस आवेदन के साथ संलग्न किया जा रहा है।
दिनांक 1.2.2004 से विपक्षी/किरायेदार की किरायेदारी प्रारम्भ होने के बाद दिनांक 1.10.2007 से विपक्षी द्वारा किराया देना बन्द कर दिया गया। जिसके बाबत पूर्व में भी आवेदक के स्वर्गीय पिता द्वारा बकाया किराया प्राप्ति व दुकान खाली कराने वास्ते दिनांक 23.07.2010 को विधिक नोटिस भेजा गया। आवेदक के पिता की मृत्यु के बाद विपक्षी द्वारा उक्त किरायेदारी वाली दुकान में अविधिक तरीके से शिकमी किरायेदार बसाया गया। आवेदक द्वारा विरोध किये जाने पर विपक्षी द्वारा पूर्व के दो शिकमी किरायेदारो को बाहर कर दिया गया परन्तु पुनः विपक्षी द्वारा वर्ष 2017 में एक शिकमी किरायेदार शोएब खान नाम के व्यक्ति को अविधिक तरीके से उक्त वादित दुकान में आबाद करा दिया गया। आवेदक के तीन पुत्र है और उन्हें अपना व्यवसाय करने वास्ते दुकान की आवश्यकता है तो आवेदक द्वारा विपक्षी से दुकान खाली कराने वास्ते व किरायेदारी समाप्त करने व शेष किराया प्रदान करने वास्ते निवेदन किया गया।
परन्तु विपक्षी द्वारा शिकमी किरायेदार से वादित दुकान खाली कराने व दुकान का कब्जा आवेदक को देने से हिला हवाली किया जाने लगा। विपक्षी/किरायेदार की नियत बद हो गयी है। और विपक्षी बकाया किराया भी अदा नहीं करना चाहते है बल्कि बदनीयती से हड़प कर जाना चाहते है। प्रश्नगत दुकान के बाबत यह निर्मुक्ति प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 21 यू.पी. एक्ट, 13 सन् 2021 ई० दी जा रही है जिस पर नियमानुसार यू.पी. एक्ट 13 सन् 2021 के प्रावधानों के अंतर्गत निर्धारित कोर्ट फीस अदा की जा रही है। वाद दर्ज कर नियमानुसार विपक्षी को नोटिस प्रेषित की गयी। विपक्षी वकालतन न्यायालय उपस्थित आये, और अपना पक्ष रखते हुये कहा गया कि किराया वादी मुकदमे को प्रदान किया जाता था तो वादी मुकदमे के द्वारा लेजर बुक में उसका इंद्राज वादी मुकदमा द्वारा के द्वारा किया जाता था तथा नोट जिसमें की रसीद दी या नही दी गई है सम्बंध में विवरण वादी मुकदमे के द्वारा वर्णित किया जाता था जिसकी छायाप्रति संलग्न 4 के रूप में दाखिल की जा रही है।
प्रार्थी को कभी भी किराया बकाया की डिमांड नोटिस वादी मुकदमे के द्वारा से भेजी गई हो प्राप्त नही हुई। प्रार्थी का वर्तमान में किराया 1000/- रूपये प्रति माह है जबकि वादी के द्वारा गलत व कम किराया बताया गया है ऐसा प्रतीत होता है कि कोर्ट फीस को कम करने के उद्देश्य से गलत बयानी वादी मुकदमे के द्वारा किया गया है जो गलत है। वादी के द्वारा यह कथन किया गया है वर्ष 2007 से किराया बाकि है जब की प्रार्थी के द्वारा माह जून 2023 तक का पूरा किराया दे दिया गया है, परन्तु वादी मुकदमे के द्वारा इस बात का इंद्राज प्रार्थी के लेजर बुक में किया गया है लेकिन उसकी रसीद प्रदान नही की गई थी। जिसके सबूत के तौर पर संलग्न 6 के साथ लेजर की छायाप्रति दाखिल की जा रही है।
अंतिम माह की रसीद दाखिल है। सारे किराया का भुगतान पेमेंट प्रार्थी के द्वारा वादी मुकदमे को ही किया जाता था जिसका प्रमाण संलग्न 7. संलग्न 8, संलग्न 9 के साथ फोटो दाखिल की जा रही है। जिसमे वादी मुकदमा खुद अपने हस्ताक्षर बना के रसीद प्रदान कर रहा है व किराया के रूपया गिन कर रखा है। वादी मुकदमे का ये दावा की प्रार्थी किराया देने में डिफाल्टर है पूर्ण रूप से बेबुनियाद है। वादी मुकदमा के यहां मुकदमा तथ्य गलत तथ्य व गलत शपथ पत्र प्रस्तुत कर बेदखल करने का है या झूठ बयान दाखिल करके न्यायालय से गलत आदेश पारित करवाने का है उन्ही तथ्यों के आधार पर यह मुकदमा खारिज करने योग्य है। उपरोक्त परिस्थितियों में माननीय न्यायालय से प्रार्थना है कि उक्त वाद सुनवाई के स्तर पर पोषणीय न होने के कारण निरस्त किया जाना न्याय की दृष्टि से अति आवश्यक व न्याय संगत है।
वहीं न्यायालय के द्वारा अपने आदेश के क्रम में कहा गया कि उपरोक्त विवेचना के आधार पर, न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि वादी स्वच्छ हाथों से न्यायालय के समक्ष नहीं आया है एवं सारवान तथ्यों को छिपाते हुए प्रस्तुत वाद दाखिल किया है। वादी का प्रार्थना पत्र तथ्यों के मिथ्यावर्णन पर आधारित है। अतः वादी का प्रार्थना पत्र पोषणीय न होने के कारण निरस्त किया जाता है। पत्रावली दाखिल दफ्तर हो।




