पीड़िता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनुज यादव, नरेश यादव, संदीप यादव और मुकेश सिंह ने पक्ष रखा

वाराणसी। न्याय के मंदिर में एक बार फिर सच्चाई की जीत हुई। वाराणसी में महिला कांस्टेबल के साथ दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध को अंजाम देने वाले फर्जी दरोगा को अदालत से कोई राहत नहीं मिली है। फास्टट्रैक कोर्ट (प्रथम) के न्यायाधीश कुलदीप सिंह ने मामले की संगीनता को देखते हुए आरोपी निखिल उर्फ निखिलेश त्रिवेदी की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया, जिससे पीड़िता और उसके परिवार को न्याय की उम्मीद की एक नई किरण मिली है।

यह मामला सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं, बल्कि भरोसे के कत्ल की एक दर्दनाक दास्तां है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता, जो खुद कानून की रक्षक है, उसी वर्दी की आड़ में एक शातिर अपराधी का शिकार बन गई। घटना का जिक्र करते हुए पीड़िता ने बताया कि 29 अक्टूबर 2024 को जब वह अन्नपूर्णा मंदिर में अपनी ड्यूटी पर तैनात थी, तभी उपनिरीक्षक की वर्दी पहने निखिल त्रिवेदी उससे मिला। उसने खुद को पुलिस मुख्यालय (PHQ), लखनऊ में कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर तैनात बताया। वर्दी और पद का रौब देखकर महिला कांस्टेबल ने भरोसा कर लिया और अपना मोबाइल नंबर साझा कर दिया।

बस यहीं से शुरू हुआ धोखे और दरिंदगी का वो खेल, जिसकी पीड़िता ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अगले ही दिन, 30 अक्टूबर को, निखिल ने उसे फोन किया और बातों का सिलसिला शुरू किया। इसके कुछ दिन बाद, 4 नवंबर 2024 को, जब महिला कांस्टेबल ड्यूटी खत्म करके अपने घर लौट रही थी, तो निखिल उसे रामापुरा चौराहे पर मिला। आरोप है कि वह जबरदस्ती उसका पीछा करते हुए उसके कमरे तक पहुंच गया। वहां उसने महिला कांस्टेबल के साथ मारपीट की, उसका मुंह दबाया और जबरन शारीरिक संबंध बनाकर उसकी अस्मत को तार-तार कर दिया।

जब पीड़िता ने किसी तरह खुद को उसके चंगुल से छुड़ाकर शोर मचाया, तो उसकी छोटी बहन मौके पर पहुंची। बहन को आता देख, आरोपी निखिल पीड़िता की छोटी बहन को अगवा करने की धमकी देते हुए वहां से फरार हो गया। इसके बाद भी उसकी हैवानियत नहीं रुकी। वह लगातार पीड़िता का पीछा करता रहा और उसकी अश्लील तस्वीरें और वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहा।

जब पीड़िता ने शक होने पर पुलिस मुख्यालय, लखनऊ में निखिल त्रिवेदी के बारे में पता किया, तो सच सामने आ गया। इस नाम का कोई भी व्यक्ति वहां तैनात नहीं था। यह जानकर पीड़िता के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने हिम्मत जुटाई और 16 नवंबर 2024 को चितईपुर थाने में इस फर्जी दरोगा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई।

पुलिस ने भी मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत कार्रवाई की और आरोपी निखिल को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के समय उसके पास से पुलिस की वर्दी, बैच, और बिल्ले जैसे आपत्तिजनक सामान भी बरामद हुए, जो उसके शातिर दिमाग और सुनियोजित साजिश की गवाही दे रहे थे।

अदालत में सुनवाई के दौरान, पीड़िता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनुज यादव, नरेश यादव, संदीप यादव और मुकेश सिंह ने मजबूती से पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि यह केवल दुष्कर्म का मामला नहीं, बल्कि वर्दी को कलंकित करने और एक महिला के भरोसे को तोड़ने का भी अपराध है। अदालत ने सभी तथ्यों और सबूतों पर गौर करने के बाद आरोपी की जमानत अर्जी खारिज कर दी और उसे सलाखों के पीछे ही रखने का फैसला सुनाया। इस फैसले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, एक न एक दिन उसे अपने किए की सजा जरूर मिलती है।

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