नगर निगम की मिलीभगत, मंदिरों पर दर्ज हुए गैर-संबंधित नाम, सड़क चौड़ीकरण और बढ़ती चिंताएं, पार्षद की मांग – हो निष्पक्ष जांच

वाराणसी। नई सड़क से चौक थाने तक प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण योजना के तहत जब प्रशासन ने दालमंडी क्षेत्र का सर्वे शुरू किया, तो कई ऐसे मामले सामने आए, जिन्होंने सभी को चौंका दिया। मंदिरों और धार्मिक ट्रस्ट की ज़मीन पर कुछ ऐसे नाम दर्ज पाए गए, जो न सिर्फ नियमों के विरुद्ध हैं, बल्कि पूरे मामले को संदेह के घेरे में भी खड़ा करते हैं।

गणेश मंदिर, सीताराम मंदिर, राधा-कृष्ण और सत्यनारायण ट्रस्ट की संपत्तियों पर मुस्लिम समुदाय के कुछ व्यक्तियों के नाम ‘सेवइत’ (धार्मिक सेवक/प्रबंधक) के तौर पर दर्ज हैं। यही नहीं, इन स्थानों पर पुराने मकान गिराकर नई इमारतें भी खड़ी कर दी गई हैं। स्थानीय लोग और पार्षदों का आरोप है कि नगर निगम के कुछ कर्मियों की मिलीभगत से यह खेल हुआ है।

नगर निगम के रिकॉर्ड में जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं :

  • मकान नंबर CK 42/100-101 में श्री गणेश जी और ठाकुर जी के नाम के साथ साथ निज़ामुद्दीन का नाम सेवइत के रूप में दर्ज है।
  • मकान CK 43/160-159-1-F में श्री ठाकुर राधा कृष्ण व सत्यनारायण जी के साथ मोहम्मद अलाउद्दीन और मोहम्मद सलाउद्दीन का नाम ट्रस्टी के तौर पर है।
  • मकान CK 43/160-V में प्रेम शंकर, गोपीनाथ के साथ रशिद जाफर, जमाल जाफर, साजिद जाफर और दीवान जाफर के नाम भी जुड़े हैं।

मंदिर और धार्मिक ट्रस्ट की संपत्ति पर ये नाम कैसे दर्ज हो गए? क्या नगर निगम की मिलीभगत से फर्जीवाड़ा हुआ? या फिर इसके पीछे कोई गहरी साजिश है?

सड़क चौड़ीकरण योजना के तहत 184 मकान इस प्रोजेक्ट की जद में हैं। शासन ने इस योजना के लिए 215 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया है। मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन अब जब ट्रस्ट और मंदिर की जमीन पर विवादित नाम सामने आए हैं, तो प्रशासन के लिए यह मामला किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं।

लोक निर्माण विभाग और नगर निगम के बीच समन्वय की कमी और रिकॉर्ड में हुई गड़बड़ियां अब सरकार की साख पर सवाल खड़े कर रही हैं।

क्षेत्रीय पार्षद इंद्रेश सिंह का कहना है कि “सड़क चौड़ीकरण में जिन मकानों की पहचान हुई है, उनमें मंदिर, ट्रस्ट, शत्रु संपत्ति और मस्जिदें भी शामिल हैं। ऐसे में जिला प्रशासन को पारदर्शी और न्यायसंगत निर्णय लेना चाहिए, जिससे सरकार की छवि धूमिल न हो।”

दालमंडी क्षेत्र के लोगों के बीच यह मुद्दा अब चर्चा का विषय बन चुका है। लोग जानना चाहते हैं कि धार्मिक ट्रस्ट की संपत्ति पर किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति का नाम कैसे दर्ज हुआ? क्या यह कानून का उल्लंघन नहीं है? क्या इसे एक धार्मिक और सामाजिक संतुलन के साथ नहीं सुलझाया जाना चाहिए?

यह पूरा मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि क्या धार्मिक आस्थाओं और ट्रस्टों की जमीन अब सुरक्षित नहीं रही? अब ज़रूरत है कि एक उच्च स्तरीय जांच के ज़रिए इन नामों की सत्यता जानी जाए और यदि कोई अनियमितता पाई जाए, तो जिम्मेदार अधिकारियों और लाभार्थियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।

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