आरोपी की तरफ से अधिवक्तागण हिमांचल सिंह, नीरज कुमार व मखंचू कुमार ने मजबूती से पक्ष रखा।

वाराणसी: मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े एक बेहद पुराने मामले में वाराणसी की अदालत से बड़ा फैसला आया है। साल 2011 में रेलवे स्टेशन से 7 किलोग्राम अवैध गांजे के साथ गिरफ्तारी के आरोपी संजय कुमार मल्लाह को अदालत ने बरी कर दिया है। यह महत्वपूर्ण आदेश न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट नं. 05, वाराणसी के न्यायाधीश यजुवेन्द्र विक्रम सिंह (उच्चतर न्यायिक सेवा) द्वारा सुनाया गया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगे आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।

क्या था पूरा मामला? = मामला आज से करीब 15 साल पुराना यानी 28 अगस्त 2011 का है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, जीआरपी कैंट पुलिस को एक खास मुखबिर से सूचना मिली थी कि कैंट रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 6/7 के पास पुराने ओवरब्रिज की पश्चिमी सीढ़ी पर दो व्यक्ति सूटकेस (अटैची) में मादक पदार्थ लेकर बैठे हैं।

पुलिस टीम ने जब घेराबंदी की, तो वहां मौजूद दो लोग भागने लगे। पुलिस ने मौके पर ही दोनों को दबोच लिया। पूछताछ में एक ने अपना नाम संजय कुमार मल्लाह (निवासी: प्रकाश नगर, शिकारपुर, पश्चिमी चम्पारण, बिहार) और दूसरे ने सलीम खान बताया। पुलिस की तलाशी में संजय कुमार मल्लाह की काले रंग की अटैची से सफेद पॉलिथीन में रखा 7 किलोग्राम अवैध गांजा बरामद होने का दावा किया गया था, जिसके बाद जीआरपी कैंट थाने में मुकदमा अपराध संख्या 1370/2011, धारा 8/20 एनडीपीएस एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया।

अदालत में क्यों कमजोर पड़ा पुलिस का दावा? = आरोपी की तरफ से अधिवक्तागण हिमांचल सिंह, नीरज कुमार व मखंचू कुमार ने मजबूती से पक्ष रखा। जहां इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट नं. 05, वाराणसी के समक्ष पुलिस की कहानी में कई गंभीर कमियां और विरोधाभास सामने आए। कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर गौर किया : सार्वजनिक गवाहों का न होना: पुलिस ने दावा किया कि गिरफ्तारी के समय मौके पर यात्रियों की भारी भीड़ मौजूद थी, लेकिन किसी भी स्वतंत्र या स्थानीय नागरिक को गवाह नहीं बनाया गया। कोर्ट ने कहा कि उन लोगों के नाम या पते तक दर्ज नहीं किए गए, जिन्होंने गवाही देने से मना किया था। अस्वाभाविक तलाशी: कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि आरोपी की तलाशी के दौरान उसके पास से सिर्फ 7 किलो गांजा मिला, लेकिन दैनिक उपयोग का या जेब से कोई दूसरा सामान्य सामान (जैसे पैसे, टिकट आदि) बरामद नहीं दिखाया गया, जो कि व्यावहारिक रूप से बेहद अस्वाभाविक है। कानूनी नियमों की अनदेखी: मामले में एनडीपीएस एक्ट की धारा 57 (गिरफ्तारी और जब्ती की रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को देने का नियम) का सही तरीके से पालन नहीं किया गया, जिससे पुलिस की पूरी कार्रवाई संदेह के घेरे में आ गई।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला = फैसला सुनाते हुए न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट नं. 05, वाराणसी ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय की नजीर (शीर्ण सेबेस्टियन बनाम आर जवाहराज 2018) का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है :

“कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि संदेह चाहे कितना भी गहरा हो, वह कभी भी कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता। अदालतों का यह हमेशा कर्तव्य है कि वे सुनिश्चित करें कि सिर्फ शक के आधार पर किसी को सजा न मिले।”

तमाम गवाहों और साक्ष्यों का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद अदालत ने माना कि पुलिस की कहानी में कई गंभीर संदेह हैं। इसी का लाभ देते हुए न्यायाधीश यजुवेन्द्र विक्रम सिंह ने आरोपी संजय कुमार मल्लाह को मु० अ० सं० संख्या 1370 सन 2011, अन्तर्गत धारा 8/20 (आदेश में तकनीकी सुधार के साथ 8/22) एनडीपीएस एक्ट के आरोपों से पूरी तरह दोषमुक्त (Acquitted) कर दिया। इसके साथ ही आरोपी के जमानत और बंधपत्र भी निरस्त कर दिए गए हैं।

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