क्या केवल औपचारिकता बनकर रह गई है प्रशासनिक कार्रवाई? कागजों में सिमट गया जिला प्रशासन का ‘रूट बार कोड’ अभियान, 4,200 की अनुमति, लेकिन सड़कों पर दौड़ रहे 1 लाख वाहन!
वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी इन दिनों एक बेहद गंभीर समस्या से जूझ रही है। जनपद की सड़कों से लेकर संकरी गलियों तक, इस समय वाराणसी में ऑटो और टोटो का आतंक पूरी तरह से फैल चुका है। स्थिति यह हो गई है कि पैदल चलने वाले राहगीर भी अब सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। ऑटो और ई-रिक्शा (टोटो) चालकों की इस बेलगामी के पीछे कहीं न कहीं प्रशासनिक निष्क्रियता और कड़े एक्शन की कमी साफ नजर आ रही है।
कागजों में सिमट गया जिला प्रशासन का ‘रूट बार कोड’ अभियान = आपको याद दिला दें कि विगत वर्ष जिला प्रशासन ने शहर की यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए एक बड़ी पहल की थी। इसके तहत सभी ऑटो और टोटो चालकों के लिए एक ‘रूट बार कोड’ जारी किया गया था। नियम के मुताबिक, जिस वाहन चालक को जो रूट अलॉट हुआ था, उसे उसी रूट पर गाड़ी चलानी थी।
लेकिन धीरे-धीरे जिला प्रशासन का यह अभियान पूरी तरह से ठंडे बस्ते में चला गया। नतीजा यह हुआ कि वाराणसी में ऑटो और टोटो का आतंक एक बार फिर सड़कों पर राज करने लगा। आज ये वाहन चालक पूरी तरह बेलगाम हो चुके हैं और शहर का कोई भी कोना ऐसा नहीं बचा है जो इनकी वजह से भीषण जाम की चपेट में न हो।

इन इलाकों में सड़कों से लेकर गलियों तक फैला है खौफ = शहर के प्रमुख व्यापारिक और रिहायशी इलाकों की बात करें तो हालात बद से बदतर हो चुके हैं। मैदागिन से कबीरचौरा, हरतीरथ चौराहे से महामृत्युंजय मंदिर, दारानगर से डीएवी कॉलेज, इंग्लिशिया लाइन चौराहा और लंका जैसे तमाम ऐसे वीआईपी और व्यस्त क्षेत्र हैं, जहां वाराणसी में ऑटो और टोटो का आतंक साफ देखा जा सकता है। इन चालकों ने न सिर्फ मुख्य सड़कों को बल्कि बनारस की पहचान कही जाने वाली संकरी गलियों को भी बंधक बना लिया है।
नियमों की धज्जियां, मनमाना किराया और यात्रियों से मारपीट = इन चालकों की मनमानी सिर्फ जाम लगाने तक सीमित नहीं है। यातायात नियमों की धज्जियां उड़ाना तो इनके लिए रोज की बात हो गई है। इसके अलावा, ये सवारियों से मनमाना किराया वसूलते हैं। अगर कोई स्थानीय नागरिक या बाहर से आया कोई पर्यटक इनके तय किए गए अवैध किराए को देने से इनकार करता है, तो उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट जैसी घटनाएं आम हो चुकी हैं। इनके रफ ड्राइविंग (गलत तरीके से वाहन चलाने) के कारण आम जनता की जान पर हमेशा खतरा मंडराता रहता है।
नेताओं का संरक्षण बना जी का जंजाल सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब भी कोई आम नागरिक या प्रशासन का कोई ईमानदार अधिकारी इन पर कार्रवाई करने की कोशिश करता है, तो शहर के कुछ तथाकथित नेता इन्हें ‘गरीब और कमजोर’ बताकर इनकी पैरवी में खड़े हो जाते हैं। नेताओं के इसी संरक्षण की वजह से इन चालकों का मनोबल सातवें आसमान पर है।
बिना परमिट के संचालित हो रहे ऑटो और ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या अब वाराणसी के लिए एक गंभीर संकट बन चुकी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, शहर में सिटी परमिट वाले लगभग 4,200 ऑटो के संचालन की ही अनुमति है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। आज बनारस की सड़कों पर करीब 1 लाख अवैध ऑटो और टोटो दौड़ रहे हैं।
अवैध रूप से संचालित इन वाहनों के कारण : सरकार को हर महीने राजस्व (Revenue) का भारी नुकसान हो रहा है। शहर के प्रमुख चौराहों और बाजारों में हर समय आपातकाल जैसी जाम की स्थिति बनी रहती है। इन बिना वेरिफिकेशन वाले चालकों के कारण शहर में अपराध की घटनाओं में भी इजाफा हो रहा है।
क्या केवल औपचारिकता बनकर रह गई है प्रशासनिक कार्रवाई? = स्थानीय निवासियों का सीधा आरोप है कि प्रशासन द्वारा समय-समय पर चलाए जाने वाले चेकिंग अभियान महज एक दिखावा या औपचारिकता बनकर रह गए हैं। अभियान शुरू होते ही कुछ दिन कड़ाई दिखती है, लेकिन फिर से स्थिति वैसी ही हो जाती है। अवैध संचालन पर कोई प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या जिला प्रशासन और परिवहन विभाग (RTO) इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच करेगा? क्या वाराणसी में ऑटो और टोटो का आतंक खत्म करने के लिए कोई ठोस और परमानेंट एक्शन लिया जाएगा, या फिर बाबा विश्वनाथ की नगरी ऐसे ही जाम और बदहाली के आंसू रोती रहेगी?



