बस्ती: उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में उस वक्त हड़कंप मच गया जब एडीएम झांसी व उनकी पीसीएस पत्नी बस्ती पुलिस के खिलाफ धरने पर बैठ गए। मामला बस्ती के परशुरामपुर थाने से लापता हुए दरोगा अजय गौड़ की संदिग्ध मौत से जुड़ा है। अपने भाई का शव मिलने के बाद झांसी में तैनात एडीएम अरुण गौड़ का सब्र जवाब दे गया और उन्होंने पोस्टमार्टम हाउस पर ही मोर्चा खोल दिया।
सोमवार को पोस्टमार्टम हाउस का नजारा भावुक और आक्रोशित करने वाला था। एडीएम झांसी व उनकी पीसीएस पत्नी बस्ती पुलिस के खिलाफ धरने पर इसलिए बैठे क्योंकि उन्हें अपने भाई की मौत में गहरी साजिश और पुलिस की घोर लापरवाही नजर आई।
एडीएम अरुण गौड़ ने आरोप लगाया कि सूचना छिपाने का खेल: उनके भाई 5 फरवरी से लापता थे, लेकिन स्थानीय पुलिस ने परिवार को कोई जानकारी नहीं दी। भ्रामक सर्च ऑपरेशन: एडीएम का आरोप है कि पुलिस को पता था कि अजय अयोध्या की तरफ गए हैं, फिर भी जानबूझकर अमहट घाट पर सर्च ऑपरेशन चलाकर समय बर्बाद किया गया। शव की स्थिति पर संदेह: एडीएम ने कहा, “भाई की लाश देखकर लग रहा है जैसे उसे साफ किया गया हो, 4 दिन पानी में रहने के बाद भी मिट्टी या कीचड़ का निशान न होना संदेहास्पद है।”
धरने के दौरान एडीएम झांसी व उनकी पीसीएस पत्नी बस्ती पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करते दिखे। अरुण गौड़ ने हर्रैया की सीओ स्वर्णिमा सिंह पर बदसलूकी का आरोप लगाया। उन्होंने दुख जताया कि पूरी रात वह परिवार के साथ पोस्टमार्टम हाउस पर अलाव जलाकर बैठे रहे, लेकिन बस्ती के एसपी मोबाइल बंद कर सोते रहे और कोई भी बड़ा अधिकारी उनका हाल जानने नहीं आया।
हालात तब और संवेदनशील हो गए जब एडीएम झांसी व उनकी पीसीएस पत्नी बस्ती पुलिस के खिलाफ धरने पर बैठे थे, लेकिन माहौल बिगड़ता देख उनकी पत्नी ज्योति (जो स्वयं पीसीएस अफसर हैं) ने उन्हें मनाया। उन्होंने डीआईजी संजीव त्यागी से मिलने का अनुरोध किया, जिसके बाद डीआईजी ने मामले की निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया।
बड़ी लापरवाही: एडीएम का कहना है कि यदि पुलिस ने समय रहते सीसीटीवी फुटेज खंगाले होते, तो शायद उनके भाई की जान बचाई जा सकती थी। पुलिस ने पूरे मामले को बहुत हल्के में लिया।
एडीएम के गुस्से और भारी भीड़ को देखते हुए पोस्टमार्टम हाउस को सुरक्षा घेरे में ले लिया गया था। कई थानों की फोर्स तैनात रही। हालांकि, जिस हर्रैया सर्किल का यह मामला था, वहां की सीओ मौके पर नदारद रहीं, जिसे लेकर भी परिजनों में भारी नाराजगी देखी गई।
यह घटना बताती है कि जब एक एडीएम स्तर के अधिकारी को न्याय के लिए बस्ती पुलिस के खिलाफ धरने पर बैठना पड़ रहा है, तो आम आदमी की स्थिति क्या होगी? अजय गौड़ की मौत महज एक हादसा है या विभाग के भीतर का कोई काला सच, यह अब जांच का विषय है।



