पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर जो टिप्पणी की है, उस पर काफी विवाद छिड़ गया है। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप या विचारों में असहमति आम बात है, लेकिन जब बात देश की विदेश नीति या प्रधानमंत्री की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की हो, तो यह सिर्फ घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहती, इसके दूरगामी राजनयिक प्रभाव भी हो सकते हैं।
भगवंत मान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि वे “140 करोड़ लोगों वाले देश में नहीं रहते, बल्कि 10,000 की आबादी वाले देशों का दौरा करते हैं।” इस बयान पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति जताई है और इसे “गैर-जिम्मेदाराना और खेदजनक” बताया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ़ किया कि भारत सरकार “राज्य के एक उच्च पदाधिकारी” की ऐसी “अनुचित टिप्पणियों” से खुद को अलग करती है, जो मित्र देशों के साथ भारत के संबंधों को कमजोर कर सकती हैं।
क्यों हैं ये बयान गंभीर? – भगवंत मान को समझना होगा कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं सिर्फ द्विपक्षीय या बहुपक्षीय बैठकें नहीं होतीं। वे भारत की वैश्विक स्थिति, रणनीतिक साझेदारी, निवेश की संभावनाओं और सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर को मजबूत करने का माध्यम होती हैं। प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों के दौरान दिए गए बयान और घोषणाएं भारत की विदेश नीति का चेहरा बनती हैं।
ऐसे में जब देश का एक मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से इन यात्राओं का मज़ाक उड़ाता है, तो विदेशी सरकारें और राजनयिक संस्थान भारत की आंतरिक एकता, राजनीतिक परिपक्वता और स्थिरता पर सवाल उठा सकते हैं। विदेशी राष्ट्र भारत के अंदरूनी राजनीतिक मतभेदों को बहुत बारीकी से देखते हैं। भगवंत मान जैसे नेताओं की टिप्पणियां यह संकेत दे सकती हैं कि भारत की विदेश नीति पर विपक्षी दलों का भरोसा नहीं है। इससे भारत की राजनयिक विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है, खासकर तब जब भारत ग्लोबल साउथ का नेतृत्व कर रहा हो और G20 जैसे मंचों पर मुखर भूमिका निभा रहा हो।
राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर – एक लोकतांत्रिक देश में आलोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बेहद ज़रूरी है, लेकिन राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री विदेश में सिर्फ अपनी सरकार का नहीं, बल्कि पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में उनके प्रयासों का उपहास उड़ाना अंततः देश के सामूहिक सम्मान को चोट पहुँचा सकता है।
विदेशी मीडिया अक्सर भारतीय नेताओं की ऐसी टिप्पणियों को उद्धृत करता है और कई बार उन्हें संदर्भ से बाहर पेश करके भारत को नुकसान पहुँचाया जाता है। भगवंत मान की टिप्पणी भी इसी श्रेणी में आ सकती है, जिससे भारत की विदेश नीति को लेकर भ्रम फैल सकता है। यह निवेशकों, रणनीतिक भागीदारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भारत के प्रति धारणा को भी प्रभावित कर सकता है।
भारत जैसी उभरती वैश्विक शक्ति के लिए यह ज़रूरी है कि उसके आंतरिक राजनीतिक मतभेद अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित न करें। विदेश यात्रा जैसे संवेदनशील विषयों पर राजनीतिक बयानबाज़ी भारत की एकजुटता पर सवाल खड़े कर सकती है। यह संदेश जा सकता है कि भारत का राजनीतिक नेतृत्व राष्ट्रीय हितों पर राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देता है, जो किसी भी देश की छवि के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
यह पहली बार नहीं है! – यह भी बता दें कि भगवंत मान ने पहली बार ऐसा बयान नहीं दिया है। पहले भी उनके बयानों से भारतीय कूटनीति के लिए असहज स्थिति बनी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भगवंत मान ने अपने विदेश दौरों पर (खासकर जर्मनी और यूके में) परोक्ष रूप से भारत में लोकतंत्र के हालात पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि “हम पंजाब में लोकतंत्र को ज़िंदा रखे हुए हैं जबकि अन्य राज्य दबाव में हैं।” इससे विदेशी राजनयिक समुदाय में यह संदेश गया था कि भारत के भीतर लोकतांत्रिक स्थिति पर निर्वाचित नेता भी असहमति जताते हैं, जो भारत के विरुद्ध प्रचार को बल देता है।
मुख्यमंत्री भगवंत मान की प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर की गई टिप्पणी शायद एक सीमित राजनीतिक फायदे की मंशा से की गई हो, लेकिन इसके प्रभाव व्यापक हो सकते हैं। लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन राष्ट्रीय हितों के साथ संतुलन बनाना ज़रूरी है। कूटनीति केवल विदेश मंत्रालय की ही नहीं, बल्कि सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों की भी जिम्मेदारी होती है। सभी को देश की वैश्विक प्रतिष्ठा के संरक्षण में अपनी भूमिका समझनी चाहिए और उसी के अनुरूप आचरण करना चाहिए। व्यक्तिगत बयानबाज़ी का खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ सकता है, यह बात भगवंत मान जैसे नेताओं को समझनी चाहिए।





