हजारों परिवारों की चीखें की जा रही हैं अनसुनी, मारे जा रहे दुकानदार

वाराणसी की दालमण्डी गली चौड़ीकरण मामले में दुकानदारों का भारी विरोध। जानें कैसे मकान मालिकों की ‘चांदी’ हो रही है और चौड़ीकरण की भेंट चढ़े कारोबारी व उनके कारोबार बर्बादी की कगार पर हैं।

विनय यादव

वाराणसी। पूर्वांचल की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक मंडियों में शुमार दालमण्डी गली चौड़ीकरण का मामला अब एक बड़े विरोधाभास और गहरे असंतोष का केंद्र बन गया है। विकास की बयार में जहाँ बुनियादी ढांचे को सुधारने की बात हो रही है, वहीं ज़मीनी हकीकत यह है कि इस चौड़ीकरण की भेंट चढ़े कारोबारी व उनके कारोबार पूरी तरह तबाह होने की कगार पर हैं।

मकान मालिकों को मुआवजा, दुकानदारों को निराशा – दालमण्डी में हो रहे इस बदलाव ने एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ जहाँ मकान मालिकों की ‘चांदी’ हो रही है क्योंकि उन्हें शासन द्वारा मुआवजे के रूप में मोटी रकम दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं भवनों में दशकों से व्यापार कर रहे किराएदार दुकानदारों के हाथ ‘ठेंगा’ लगा है। इस योजना ने दुकानदारों के भीतर भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। सालों से अपनी मेहनत की कमाई से दुकान चलाने वाले इन व्यापारियों को मुआवजे के नाम पर कुछ भी हासिल नहीं हुआ है।

‘नजराने’ का दर्द: बिना लिखा-पढ़ी के डूबे लाखों रुपये – दालमण्डी की व्यापारिक संस्कृति में यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यहाँ कोई भी दुकान किराए पर लेने के लिए भवन मालिक को ‘नजराना’ (पगड़ी) के रूप में एक बड़ी रकम दी जाती है। लाखों का निवेश: दुकानदार लाखों रुपये का नजराना देने के बाद ही मासिक किराए पर दुकान पाते हैं। कोई रिकॉर्ड नहीं: सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस मोटी रकम की कोई लिखित लिखा-पढ़ी नहीं होती। कर्ज का बोझ: कई छोटे दुकानदार ऐसे हैं जिन्होंने अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए कर्ज लेकर यह नजराना दिया था। आज जब उनकी दुकानें बुलडोजर की भेंट चढ़ने जा रही हैं, तो उनके सामने दोहरी मार है—सिर पर कर्ज का बोझ और भविष्य का अंधकार।

“विकास होना चाहिए, परंतु किसी का विनाश करके नहीं। दुकानदारों की आजीविका छीनना न्यायसंगत नहीं है।”

सरकारी तंत्र का रवैया फिलहाल केवल काम पूरा करने पर केंद्रित है। प्रशासन चाहता है कि दालमण्डी गली चौड़ीकरण का कार्य युद्धस्तर पर जल्द से जल्द पूरा हो जाए। लेकिन इस जल्दबाजी में उन हजारों परिवारों की चीखें अनसुनी की जा रही हैं जिनका अस्तित्व इन दुकानों से जुड़ा है। दालमण्डी गली चौड़ीकरण में मारे जा रहे दुकानदार आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। न तो मकान मालिक उनकी सुध ले रहे हैं और न ही प्रशासन उनके पुनर्वास या मुआवजे की कोई ठोस योजना पेश कर रहा है।

शासन को लेना होगा मजबूत फैसला – वाराणसी का यह ऐतिहासिक बाज़ार सिर्फ ईंट-पत्थरों की गलियां नहीं, बल्कि हजारों लोगों की उम्मीदें हैं। शासन और प्रशासन को चाहिए कि वे मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए दुकानदारों के हितों और उनकी आजीविका को ध्यान में रखकर कोई मजबूत निर्णय लें। विकास तभी सार्थक है जब वह सर्वसमावेशी हो।

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