सारंग नाथ पाण्डेय

आज की दुनिया में जब भी हम संचार, जानकारी या मनोरंजन की बात करते हैं, तो सबसे पहले दिमाग में सोशल मीडिया का नाम आता है। यह केवल संवाद का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह जीवनशैली का एक हिस्सा बन चुका है। बच्चे, युवा, बुजुर्ग, महिलाएँ, शिक्षक, व्यापारी, राजनेता—सबकी दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा अब फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर बीतने लगा है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि छात्रों की पढ़ाई और शिक्षा पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। सोशल मीडिया ने शिक्षा को जहाँ एक ओर सुविधाजनक और रोचक बनाया है, वहीं दूसरी ओर कई चुनौतियाँ भी खड़ी कर दी हैं। यही कारण है कि आज शिक्षा और सोशल मीडिया का संबंध एक गंभीर बहस का विषय बन चुका है।

विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई हमेशा से ही मेहनत, अनुशासन और एकाग्रता की माँग करती रही है। परंतु सोशल मीडिया ने इस पारंपरिक ढाँचे को बदल दिया है। अब किताबों और कक्षाओं के अतिरिक्त ऑनलाइन नोट्स, डिजिटल लेक्चर और स्टडी ग्रुप भी पढ़ाई का हिस्सा बन गए हैं। आज का छात्र केवल अपने शिक्षक या पुस्तकालय पर निर्भर नहीं है। वह एक क्लिक से विश्व की श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों और विद्वानों की बातों तक पहुँच सकता है। उदाहरण के लिए, यूट्यूब पर गणित, विज्ञान या भाषा के हज़ारों चैनल उपलब्ध हैं, जहाँ जटिल विषयों को सरल ढंग से समझाया जाता है। इसी तरह गूगल क्लासरूम या ज़ूम के माध्यम से ऑनलाइन कक्षाएँ संचालित होती हैं। फेसबुक और टेलीग्राम पर बने स्टडी ग्रुप छात्रों को प्रश्न पूछने, उत्तर देने और सामूहिक तैयारी करने का अवसर प्रदान करते हैं। इस दृष्टि से सोशल मीडिया शिक्षा में क्रांति लाने वाला सिद्ध हुआ है।

परंतु इस क्रांति का दूसरा पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सोशल मीडिया छात्रों का सबसे बड़ा ध्यान भटकाने वाला साधन भी बन गया है। जब छात्र पढ़ाई करने बैठते हैं तो मोबाइल पर आने वाला एक छोटा-सा नोटिफिकेशन उन्हें कई मिनटों या घंटों तक पढ़ाई से दूर कर देता है। अक्सर छात्र सोचते हैं कि बस पाँच मिनट के लिए मोबाइल देखेंगे, लेकिन देखते-देखते आधा घंटा बीत जाता है। यह आदत धीरे-धीरे समय की बर्बादी का कारण बन जाती है। इससे न केवल पढ़ाई का समय घटता है, बल्कि एकाग्रता भी कमजोर होती है। लंबे समय में यह छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

इसके अतिरिक्त सोशल मीडिया ने तुलना की संस्कृति को भी जन्म दिया है। जब छात्र अपने सहपाठियों या मित्रों को सफलता के साथ तस्वीरें साझा करते हुए देखते हैं, तो वे स्वयं को कमतर महसूस करने लगते हैं। यह भावना कभी-कभी उन्हें पढ़ाई के प्रति हतोत्साहित कर देती है। अवसाद और तनाव की स्थिति भी उत्पन्न होती है। कई शोधों में यह पाया गया है कि अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग करने वाले छात्रों में चिंता और हीनभावना की प्रवृत्ति अधिक होती है। यह मानसिक दबाव उनकी पढ़ाई और आत्मविश्वास दोनों पर असर डालता है।

हालाँकि, यह भी सच है कि यदि सोशल मीडिया का प्रयोग संयम और विवेक से किया जाए तो यह पढ़ाई का सबसे सशक्त साधन बन सकता है। आज कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र टेलीग्राम और यूट्यूब से मुफ्त में अध्ययन सामग्री प्राप्त कर रहे हैं। शिक्षक भी अब डिजिटल माध्यम से छात्रों तक पहुँचने लगे हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान जब विद्यालय और विश्वविद्यालय बंद थे, तब सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म ही छात्रों के लिए शिक्षा का मुख्य साधन बने। इससे यह सिद्ध हो गया कि समय और परिस्थिति के अनुसार सोशल मीडिया शिक्षा की निरंतरता बनाए रखने में सक्षम है।

सोशल मीडिया ने छात्रों के भाषा और संचार कौशल पर भी सकारात्मक असर डाला है। अलग-अलग राज्यों और देशों के लोगों से संवाद करने से उनकी अभिव्यक्ति शक्ति बढ़ी है। उन्हें नई-नई जानकारियाँ और दृष्टिकोण प्राप्त होते हैं। अंग्रेज़ी सहित अन्य भाषाओं में संवाद करने से उनकी भाषा दक्षता भी बढ़ती है। यही नहीं, सोशल मीडिया ने छात्रों को रचनात्मकता का भी मंच दिया है। कई छात्र अपने ज्ञान, कविताएँ, कहानियाँ या कला साझा करके आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।

लेकिन इन सबके बीच यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सोशल मीडिया की लत छात्रों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रही है। लगातार मोबाइल या लैपटॉप पर समय बिताने से नींद कम होती है, आँखों पर दबाव पड़ता है और सिरदर्द व थकान जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं। देर रात तक सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने से नींद की दिनचर्या बिगड़ जाती है, जिसका असर अगले दिन की पढ़ाई और स्मरणशक्ति पर पड़ता है। शारीरिक निष्क्रियता भी बढ़ती है क्योंकि छात्र अधिकतर समय मोबाइल पर ही गुजारने लगते हैं।

शिक्षा और सोशल मीडिया के इस जटिल रिश्ते को सँभालने की जिम्मेदारी केवल छात्रों पर ही नहीं है, बल्कि अभिभावकों और शिक्षकों पर भी है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को समय का महत्व समझाएँ, मोबाइल उपयोग के लिए सीमाएँ निर्धारित करें और बच्चों के साथ संवाद बनाए रखें। शिक्षक भी छात्रों को डिजिटल साक्षरता प्रदान करें, यानी यह सिखाएँ कि कौन-सी सामग्री उपयोगी है और कौन-सी केवल समय की बर्बादी है। यदि विद्यालय स्तर पर इस दिशा में पहल की जाए तो छात्र सही ढंग से सोशल मीडिया का लाभ उठा सकते हैं।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो सोशल मीडिया ने छात्रों को स्थानीय सीमाओं से निकालकर वैश्विक नागरिक बना दिया है। अब वे अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं, शोध और प्रतियोगिताओं में भाग ले सकते हैं। इससे उनकी सोच का दायरा विस्तृत होता है और वे केवल किताबों तक सीमित न रहकर वास्तविक जीवन की समस्याओं पर भी ध्यान केंद्रित करते हैं। यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य भी है कि छात्र भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हों।

अंततः कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया छात्रों की पढ़ाई पर प्रभाव डालने वाला एक दोधारी अस्त्र है। यदि इसे सही ढंग से प्रयोग किया जाए तो यह ज्ञान का महासागर है, परंतु यदि इसे अंधाधुंध अपनाया जाए तो यह समय और ऊर्जा की बर्बादी बन जाता है। आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि वे सोशल मीडिया के प्रयोग में संतुलन स्थापित करें। अनुशासन, आत्मसंयम और सही दिशा में उपयोग ही उन्हें सफलता की ओर ले जा सकता है। सोशल मीडिया के इस युग में वही छात्र आगे बढ़ेंगे जो इसके सकारात्मक पक्ष को अपनाएँगे और नकारात्मक पक्ष से स्वयं को बचाकर रखेंगे।

इस प्रकार सोशल मीडिया छात्रों की पढ़ाई पर गहरा असर डाल रहा है। यह असर अवसर भी है और चुनौती भी। यह विद्यार्थियों पर निर्भर करता है कि वे इसे अपने भविष्य निर्माण का साधन बनाते हैं या समय बर्बादी का जाल। सच तो यह है कि सोशल मीडिया अब छात्रों के जीवन से अलग नहीं किया जा सकता, इसलिए आवश्यक है कि इसे पढ़ाई और शिक्षा के पूरक साधन के रूप में अपनाया जाए। जब तक छात्र इसे साधन बनाकर उपयोग करेंगे, तब तक यह उनकी सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगा, लेकिन यदि वे स्वयं इसके साधन बन गए तो यह उनके लिए बाधा का कारण बन जाएगा। यही शिक्षा जगत और समाज की सबसे बड़ी चुनौती है और यही अवसर भी।

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