अपहरण मामले में सात साल की बच्ची की मां को मिली जमानत, अदालत ने कहा- मां का ममत्व और स्नेह जरूरी
मुंबई: मुंबई की दिंडोशी अदालत ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है जो कानूनी दांव-पेंच से परे, इंसानियत और रिश्तों के महत्व को दर्शाता है। अदालत ने 2013 के एक अपहरण मामले में गिरफ्तार एक महिला को जमानत दे दी। यह फैसला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है, क्योंकि अदालत ने कहा कि किसी भी बच्चे को उसके प्राकृतिक अभिभावक के स्नेह से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
इस मामले की कहानी थोड़ी उलझी हुई है। 2013 में मुंबई के डीएन नगर थाने में एक 7 साल की बच्ची के अपहरण का मामला दर्ज किया गया था। वह बच्ची स्कूल से लौटते वक्त लापता हो गई थी। लगभग नौ साल तक वह बच्ची लापता रही, जब तक कि अगस्त 2022 में एक वीडियो कॉल के दौरान एक पड़ोसी ने उसे नहीं पहचान लिया। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और आरोपी महिला और उसके पति को गिरफ्तार कर लिया।
अपहरण के बाद, पीड़ित बच्ची ने पुलिस को दिए अपने बयान में दिल दहला देने वाली बातें बताईं। उसने कहा कि आरोपी उसे आइसक्रीम का लालच देकर ले गए थे। उसे पहले गोवा ले जाया गया, फिर मुंबई लाया गया, और दोबारा गोवा। इस दौरान उसे कर्नाटक के एक स्कूल में भी भर्ती कराया गया। मुंबई में लाकर उससे घरेलू काम करवाए गए और बेबीसिटिंग भी कराई गई। उसकी कमाई भी आरोपियों ने खुद रखी। बच्ची ने शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के आरोप भी लगाए।
यह सब होने के बावजूद, दिंडोशी अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एस. एम. तकालिकर ने मानवीय पहलू पर जोर दिया। उन्होंने देखा कि महिला 2022 से जेल में है और अब तक मुकदमे की सुनवाई में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। न गवाहों के बयान हुए हैं और न ही केस आगे बढ़ा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोपी महिला खुद भी एक सात साल की बच्ची की माँ है, जो पिछले तीन सालों से अंधेरी के एक बाल भवन (अनाथालय) में रह रही है और अपनी माँ से नहीं मिल पाई है। अदालत ने माना कि गंभीर आरोप होने के बावजूद, महिला को जमानत देना उचित है। अदालत ने साफ कहा कि एक बच्ची को उसकी माँ से दूर रखना सही नहीं है और प्राकृतिक अभिभावक का स्नेह किसी भी बच्चे से छीना नहीं जा सकता।
अदालत के इस फैसले के बाद, महिला को जमानत मिल गई है, जबकि उसका पति अभी भी जेल में है। अब आरोपी माँ को अपनी बेटी से मिलने का मौका मिलेगा। यह फैसला दिखाता है कि कानून कठोर हो सकता है, लेकिन न्याय की नींव में हमेशा इंसानियत और संवेदना होनी चाहिए।




