वाराणसी। आधुनिकता की दौड़ में जहाँ हम अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं, वहीं वाराणसी के होली हार्ट्स स्कूल का सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘रिवाज़ से रिश्ते तक’ एक ऐसी सुखद बयार बनकर आया, जिसने हर किसी को भारतीय संस्कारों की गहराई से रूबरू करा दिया। नागरी नाटक मंडली के मंच पर जब बच्चों ने भारतीय परंपराओं का जीवंत मंचन किया, तो पूरा प्रेक्षागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
संस्कारों और आधुनिकता का अद्भुत संगम – होली हार्ट्स स्कूल का सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘रिवाज़ से रिश्ते तक’ केवल एक स्कूल का फंक्शन मात्र नहीं था, बल्कि यह हमारी लुप्त होती सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक सार्थक प्रयास था। डॉ. अंचित ठुकराल (निदेशक) के कुशल मार्गदर्शन और निशा ठुकराल (चेयरपर्सन) के प्रेरणादायी नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम ने यह साबित कर दिया कि शिक्षा के साथ-साथ संस्कार ही एक संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इस कार्यक्रम के माध्यम से विवाह संस्कारों और पारिवारिक परंपराओं का सजीव चित्रण किया गया, जिसने दर्शकों को भावुक भी किया और गर्व की अनुभूति भी कराई।
कार्यक्रम में कई ऐसी प्रस्तुतियाँ रहीं, जिन्होंने मंच पर भारतीय विविधता के रंगों को बिखेर दिया। प्रमुख आकर्षणों में शामिल थे: रंगमंच की रंगोली: कला और संस्कृति का भव्य आरंभ। बंधन और महफिल-ए-मेहंदी: रिश्तों की मिठास और रीति-रिवाजों का संगम। मुबारक निकाह और सात फेरों की साथियाँ: विभिन्न सांस्कृतिक मान्यताओं और प्रेम के एक ही सूत्र को बखूबी दिखाया गया। दावत-ए-खुशआमदीद: भारतीय अतिथि सत्कार की परंपरा का अनूठा चित्रण। इन प्रस्तुतियों के जरिए प्रेम, सम्मान, प्रतिबद्धता और एकता जैसे शाश्वत मूल्यों को प्रमुखता से उभारा गया।
परंपराएँ ही रिश्तों की बुनियाद हैं – होली हार्ट्स स्कूल का सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘रिवाज़ से रिश्ते तक’ का मूल संदेश यही था कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, हमारी परंपराएँ ही हमारे रिश्तों को मजबूती प्रदान करती हैं। सांस्कृतिक समृद्धि से ओत-प्रोत इस कार्यक्रम ने युवाओं को यह संदेश दिया कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर ही हम एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। कार्यक्रम की अभूतपूर्व सफलता पर विद्यालय प्रशासन ने खुशी जाहिर की। इस सफल आयोजन के लिए स्कूल ने सभी समन्वयकों, समर्पित शिक्षकों, ऊर्जावान विद्यार्थियों, सहायक कर्मचारियों और विशेष रूप से अभिभावकों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।
“जब बच्चे मंच पर अपनी संस्कृति को जीते हैं, तो वे केवल अभिनय नहीं कर रहे होते, बल्कि वे अपने भविष्य की नींव रख रहे होते हैं।” — विद्यालय प्रशासन







