वाराणसी। हिंदू धर्म और सनातन परंपरा में जितिया पर्व या जीवित्पुत्रिका व्रत का विशेष महत्व है। यह पर्व माताओं द्वारा अपनी संतानों की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और कल्याण के लिए किया जाता है। जिस तरह विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लंबी उम्र के लिए हरितालिका तीज का कठिन उपवास रखती हैं, उसी तरह माताएं अपने बच्चों की रक्षा और जीवन में आने वाली हर विपत्ति को दूर करने के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।

कहां-कहां मनाया जाता है जितिया? – यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल सहित पूर्वी भारत के कई हिस्सों में बड़ी आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। खासकर मिथिला, कोसी और मगध क्षेत्रों में इस व्रत की परंपरा सदियों पुरानी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जितिया व्रत केवल एक उपवास या परंपरा नहीं है, बल्कि यह मां के असीम प्रेम, त्याग और मातृत्व के अद्भुत स्वरूप को दर्शाता है। विद्वानों का मानना है कि यह व्रत संतान की रक्षा और उनकी सफलता के लिए मां का सबसे बड़ा संकल्प है। इस पर्व के माध्यम से माताएं भगवान से प्रार्थना करती हैं कि उनकी संतान हर संकट से सुरक्षित रहे और उनकी आयु लंबी हो।

पौराणिक मान्यताएं और व्रत का महत्व – ज्योतिष आचार्य डॉ. श्रीपति त्रिपाठी के अनुसार, “जितिया पर्व मातृत्व के उस स्वरूप का प्रतीक है, जिसमें एक मां अपनी संतान की लंबी आयु और सुखी जीवन के लिए सबसे कठिन तपस्या करती है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां के त्याग और प्रेम का जीवंत उदाहरण है।”

जितिया व्रत की जड़ें पौराणिक कथाओं से जुड़ी हैं। शास्त्रों के अनुसार, यह व्रत जीवपुत्र वाहन नागराज की कथा से संबंधित है। कहानी के अनुसार, एक बार गरुड़ ने एक नाग कुमार को निगलने का प्रयास किया, तब जीवपुत्र नाग ने अपने प्राणों का बलिदान देकर उस नाग कुमार की रक्षा की थी। माताओं द्वारा किया जाने वाला यह व्रत उसी त्याग और रक्षा भावना की याद में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान पर आने वाले अचानक मृत्यु का संकट टल जाता है और उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व – जितिया व्रत सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह पर्व मां और संतान के बीच अटूट बंधन का प्रतीक है। बिहार और पूर्वी भारत के गांवों में यह पर्व माताओं की आस्था और परिवार के सामूहिक उत्सव का हिस्सा बन चुका है। महिलाएं एक साथ मिलकर गीत गाती हैं, कथा सुनती हैं और व्रत की परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को त्याग, अनुशासन और मातृत्व की शक्ति का संदेश भी देता है।

जितिया व्रत मातृत्व, आस्था और त्याग का एक अद्भुत संगम है। संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और जीवन में सफलता की कामना के लिए माताएं यह कठिन व्रत पूरी श्रद्धा से करती हैं। यह पर्व हर मायने में भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक अनूठा उत्सव है।

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