वाराणसी: धर्म और शिक्षा की नगरी काशी में इन दिनों शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल विवादों के केंद्र में हैं। काशी में निजी स्कूलों की मनमानी को लेकर अभिभावकों का आक्रोश अब खुलकर सामने आ रहा है। स्कूलों द्वारा फीस और किताबों के नाम पर की जा रही कथित लूट ने मध्यम वर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है।

सैलरी के बराबर किताबों का दाम: अभिभावकों का दर्द अभिभावकों का सीधा आरोप है कि स्कूल प्रबंधन फीस, किताबों और अन्य मदों में खुलेआम मनमानी कर रहे हैं, जिससे आम परिवारों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। विरोध कर रहे परिजनों का कहना है कि समस्त स्कूलों में किताबों के दाम इतने अधिक हैं कि वे एक निजी नौकरी करने वाले व्यक्ति की मासिक आय के बराबर पड़ते हैं।

एक अभिभावक ने बताया, “जितनी हमारी महीने की सैलरी नहीं है, उससे ज्यादा का बोझ सिर्फ किताबों और ड्रेस के नाम पर डाल दिया गया है। काशी में निजी स्कूलों की मनमानी इस कदर बढ़ गई है कि शिक्षा अब सेवा नहीं बल्कि एक महंगा व्यापार बन चुकी है।”

कमीशनखोरी और दबाव का खेल – अभिभावकों ने यह भी आरोप लगाया कि स्कूलों में कमीशनखोरी और दबाव की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। स्कूलों द्वारा खास दुकानों से ही सामान खरीदने का दबाव बनाया जाता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। स्थिति यह है कि यदि यही हालात बने रहे, तो कई परिवारों के लिए अपने बच्चों की शिक्षा जारी रखना नामुमकिन हो जाएगा।

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग – नाराज अभिभावकों ने अब इस मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रदेश की योगी सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि निजी स्कूलों के लिए स्पष्ट मानक तय किए जाएं और उनकी मनमानी पर सख्ती से रोक लगाई जाए।

काशी की जनता को पूरा भरोसा है कि सरकार इस गंभीर समस्या पर ध्यान देगी और ऐसी व्यवस्था लागू करेगी, जिससे शिक्षा सभी के लिए सुलभ और किफायती बन सके। काशी में निजी स्कूलों की मनमानी पर कब लगाम लगेगी, यह देखना अब प्रशासन के हाथ में है।

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