लेखक – सारंग नाथ पाण्डेय (विभागाध्यक्ष, सनबीम स्कूल भगवानपुर वाराणसी)
आज के दौर में जब विज्ञान और तकनीक ने इंसान की ज़िंदगी को आसान बनाने के लिए असंख्य साधन उपलब्ध कराए हैं, वहीं दूसरी ओर इस आसान जीवनशैली ने कई नई चुनौतियों को जन्म दिया है। इन्हीं चुनौतियों में सबसे बड़ी चुनौती है लाइफ़स्टाइल डिज़ीज़ यानी जीवनशैली जनित बीमारियाँ। मधुमेह, मोटापा, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, थायरॉइड, फैटी लिवर, कैंसर जैसी अनेक बीमारियाँ अब सिर्फ़ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहीं बल्कि गाँव-कस्बों में भी पैर पसार चुकी हैं। डॉक्टर और वैज्ञानिक लगातार यह चेतावनी देते आ रहे हैं कि इन बीमारियों के पीछे सबसे बड़ी भूमिका हमारे खानपान और बदलते जीवनचर्या की है। “आप वही हैं जो आप खाते हैं।” यह पुरानी कहावत आज भी पूरी तरह सच साबित होती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों में लगभग 71% मौतें जीवनशैली जनित बीमारियों से होती हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है।

पिछले कुछ दशकों में भोजन की परिभाषा और स्वरूप में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले जहाँ घर का बना ताज़ा और संतुलित भोजन हमारी थाली की पहचान था, वहीं अब बाहर से आने वाला पैकेज्ड फूड, जंक फूड, फास्ट फूड और कोल्ड ड्रिंक ने हमारी थाली में जगह ले ली है। यह भोजन स्वादिष्ट तो ज़रूर लगता है लेकिन यह शरीर की ज़रूरतों को पूरा करने के बजाय उसे बीमारियों की ओर धकेल देता है। शोध बताते हैं कि पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड में अत्यधिक मात्रा में नमक, चीनी, ट्रांस फैट और प्रिज़रवेटिव होते हैं जो धीरे-धीरे शरीर को अंदर से खोखला कर देते हैं।
आज की युवा पीढ़ी के खानपान पर नज़र डालें तो साफ़ दिखाई देता है कि नाश्ते की जगह नूडल्स या पिज़्ज़ा ने ले ली है, दोपहर का भोजन बाहर के बर्गर या फ्रेंच फ्राइज़ से पूरा होता है और शाम को थकान मिटाने के लिए एनर्जी ड्रिंक या कोल्ड ड्रिंक का सहारा लिया जाता है। धीरे-धीरे यह आदत बन जाती है और शरीर को ज़रूरी पोषण न मिल पाने के कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होने लगती है। यही कारण है कि पहले जो बीमारियाँ 50 या 60 साल की उम्र में दिखाई देती थीं, अब 20 से 30 साल की उम्र में ही सामने आने लगी हैं। “जंक फूड तात्कालिक आनंद देता है लेकिन दीर्घकालिक बीमारी का कारण बनता है।”
भारत में लगभग 7.7 करोड़ लोग डायबिटीज़ से पीड़ित हैं और यह संख्या 2045 तक 13.4 करोड़ तक पहुँचने की संभावना है। यह आँकड़ा सिर्फ़ गलत खानपान और बदलते जीवनशैली का सीधा परिणाम है।

लाइफ़स्टाइल डिज़ीज़ के पीछे सिर्फ़ गलत खानपान ही नहीं बल्कि तनाव, अनियमित दिनचर्या और शारीरिक गतिविधियों का अभाव भी ज़िम्मेदार है, लेकिन खानपान को सबसे बड़ा कारण माना जाता है। शरीर को ऊर्जा देने के लिए संतुलित आहार ज़रूरी है। जब शरीर को कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज सही अनुपात में नहीं मिलते तो शरीर में असंतुलन पैदा होता है। उदाहरण के लिए, अत्यधिक चीनी और वसा से मोटापा और मधुमेह का ख़तरा बढ़ता है, अत्यधिक नमक से उच्च रक्तचाप और हृदय रोग का ख़तरा बढ़ जाता है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार, भारत में हर चौथा व्यक्ति उच्च रक्तचाप का शिकार है।
बच्चों के मामले में स्थिति और भी गंभीर है। माता-पिता व्यस्त जीवन में बच्चों को घर का बना भोजन देने की बजाय पैकेटबंद चिप्स, बिस्कुट, मीठे पेय और चॉकलेट पर निर्भर हो जाते हैं। इन आदतों के कारण छोटे-छोटे बच्चे भी मोटापे और डायबिटीज़ जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में 5 से 19 साल के लगभग 1.44 करोड़ बच्चे और किशोर मोटापे से पीड़ित हैं। यह स्थिति भविष्य की पीढ़ी के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंता पैदा करती है।

आज की पीढ़ी यह मान चुकी है कि स्वाद और सुविधा ही जीवन का उद्देश्य है। बाहर का खाना न सिर्फ़ स्वादिष्ट लगता है बल्कि यह समय भी बचाता है, जबकि घर का बना भोजन अक्सर साधारण और समय लेने वाला माना जाता है। लेकिन इस सोच ने स्वास्थ्य को पीछे धकेल दिया है। डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जीवनशैली की बीमारियों से बचने का सबसे सरल उपाय है अपनी थाली को परंपरागत भारतीय खानपान के अनुसार बनाना। दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, दही और सलाद जैसी चीज़ें शरीर के लिए सम्पूर्ण आहार का काम करती हैं। “स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है, और भोजन ही उसका सबसे बड़ा निवेश।”
फास्ट फूड कल्चर सिर्फ़ शहरों तक सीमित नहीं रहा बल्कि अब गाँवों और छोटे कस्बों में भी पिज़्ज़ा, बर्गर, नूडल्स और पैकेज्ड स्नैक्स आम हो गए हैं। बच्चे और युवा इसे आधुनिकता का प्रतीक मानकर अपनाते हैं। इस चलन ने धीरे-धीरे हमारी पारंपरिक और पोषक खाद्य आदतों को कमज़ोर कर दिया है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ रिपोर्ट (2022) के अनुसार, भारत में अस्वस्थ खानपान से होने वाली मौतें हर साल 10 लाख से अधिक हैं।
मीडिया और विज्ञापन भी इस समस्या को बढ़ाने में योगदान देते हैं। टेलीविज़न और सोशल मीडिया पर जंक फूड और कोल्ड ड्रिंक के चमकदार विज्ञापन बच्चों और युवाओं को आकर्षित करते हैं। वहीं स्वस्थ आहार के विज्ञापन बहुत कम देखने को मिलते हैं। इस स्थिति को देखते हुए सरकार और समाज की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे जनजागरूकता अभियान चलाएँ और लोगों को स्वस्थ खानपान के महत्व के बारे में शिक्षित करें।
समस्या सिर्फ़ बीमारी तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि यह आर्थिक बोझ भी बढ़ाती है। लाइफ़स्टाइल डिज़ीज़ का इलाज महंगा होता है। दवाइयाँ, टेस्ट, अस्पताल में भर्ती और लंबे समय तक इलाज आम आदमी के बजट को बिगाड़ देता है। परिवार पर मानसिक और आर्थिक दोनों तरह का दबाव पड़ता है। यही कारण है कि कहा जाता है कि “अगर आप भोजन को अपनी दवा नहीं बनाएँगे, तो एक दिन दवा ही आपका भोजन बन जाएगी।” — हिप्पोक्रेट्स
अगर इस समस्या का समाधान खोजना है तो सबसे पहले हमें अपने खानपान की आदतों में सुधार लाना होगा। ताज़ा फल, सब्ज़ियाँ, दालें, अनाज, दूध और घर का बना खाना थाली में प्राथमिकता पाना चाहिए। तला-भुना, पैकेज्ड और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों से दूरी बनानी होगी। इसके साथ ही नियमित व्यायाम, योग और ध्यान को दिनचर्या में शामिल करना भी ज़रूरी है। स्कूल स्तर पर बच्चों को संतुलित आहार और शारीरिक शिक्षा का प्रशिक्षण देना आवश्यक है ताकि बचपन से ही उनमें स्वस्थ आदतें विकसित हों।

आख़िरकार सवाल यह उठता है कि क्या गलत खानपान ही लाइफ़स्टाइल डिज़ीज़ के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार है? इसका उत्तर यह है कि खानपान प्रमुख कारण तो है लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। तनाव, नींद की कमी, नशे की आदतें और शारीरिक निष्क्रियता भी उतनी ही ज़िम्मेदार हैं। लेकिन चूँकि खानपान सबसे सीधा और नियंत्रित करने योग्य पहलू है, इसलिए अगर इसे सही कर लिया जाए तो लाइफ़स्टाइल डिज़ीज़ से बचाव की दिशा में आधी जीत हासिल हो सकती है।
आज समय की सबसे बड़ी ज़रूरत यही है कि हम अपने खानपान को लेकर गंभीर हों। सुविधा और स्वाद की दौड़ में स्वास्थ्य को न खोएँ। अगर आज हम अपनी थाली में बदलाव करेंगे, तो कल हमें अस्पतालों की कतार में खड़ा नहीं होना पड़ेगा। यही सच्चा निवेश है और यही जीवन की असली संपत्ति है।
