लेखक – सारंग नाथ पाण्डेय (विभागाध्यक्ष, सनबीम स्कूल भगवानपुर वाराणसी)

29 अगस्त का दिन भारतीय खेल इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। यह दिन हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद की जयंती के रूप में पूरे देश में राष्ट्रीय खेल दिवस के तौर पर मनाया जाता है। मेजर ध्यानचंद का जीवन भारतीय खेल संस्कृति का प्रतीक है। उन्होंने न केवल अपनी अद्भुत हॉकी प्रतिभा से भारत को तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाए, बल्कि खेलों के माध्यम से पूरी दुनिया में भारत की पहचान स्थापित की। राष्ट्रीय खेल दिवस हमें यह अवसर प्रदान करता है कि हम उनके योगदान को याद करें और खेलों के महत्व को समझते हुए उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।

खेल केवल मैदान तक सीमित नहीं रहते, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति को मजबूत बनाते हैं। खेल अनुशासन, धैर्य, टीम भावना, आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता सिखाते हैं। यही गुण किसी भी समाज और राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक होते हैं। जब कोई खिलाड़ी मैदान में पसीना बहाता है तो वह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि के लिए नहीं खेलता, बल्कि पूरे देश का सम्मान बढ़ाने के लिए मेहनत करता है। यही कारण है कि खेलों को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला माना जाता है।

आज के समय में जब भारत विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, खेलों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। भारतीय खिलाड़ियों ने पिछले वर्षों में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। चाहे नीरज चोपड़ा का ओलंपिक स्वर्ण पदक हो, पी.वी. सिंधु का बैडमिंटन में विश्व स्तरीय प्रदर्शन हो, महिला हॉकी टीम की संघर्षशील यात्रा हो या युवा पहलवानों और मुक्केबाजों का साहसिक प्रदर्शन हो—हर क्षेत्र में भारतीय खेल नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं। इन खिलाड़ियों ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही अवसर और संसाधन मिलें तो भारतीय प्रतिभा किसी से कम नहीं है।

राष्ट्रीय खेल दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि खेल केवल पदक जीतने या रिकॉर्ड बनाने का साधन नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के संतुलन का प्रतीक हैं। एक स्वस्थ शरीर और सकारात्मक मन ही किसी समाज को आगे बढ़ा सकते हैं। यही कारण है कि विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में खेलों को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता है। जब बच्चे मैदान में खेलते हैं, तो वे केवल शारीरिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी मजबूत बनते हैं। खेल उन्हें हार-जीत का महत्व सिखाते हैं, असफलता से सीखने की आदत डालते हैं और आत्मविश्वास से भरते हैं।

भारत सरकार ने हाल के वर्षों में खेलों को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। “खेलो इंडिया” अभियान ने लाखों युवाओं को खेलों से जोड़ने का काम किया है। “फिट इंडिया” आंदोलन ने पूरे देश को स्वास्थ्य और फिटनेस की ओर प्रेरित किया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने खेलों और शारीरिक शिक्षा को बच्चों की पढ़ाई का महत्वपूर्ण हिस्सा मानकर उसे नई दिशा दी है। इसके अलावा “राष्ट्रीय खेल नीति 2025” का खाका तैयार किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य खेलों को केवल प्रतियोगिता का माध्यम न मानकर जीवन संस्कृति के रूप में स्थापित करना है। इन प्रयासों से यह स्पष्ट है कि भारत खेलों के क्षेत्र में एक नई क्रांति की ओर बढ़ रहा है।

हालाँकि अभी भी कई चुनौतियाँ हमारे सामने हैं। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में प्रतिभाओं को सही मंच और संसाधन नहीं मिल पाते। खेलों के बुनियादी ढांचे की कमी, प्रशिक्षकों की उपलब्धता, खिलाड़ियों के लिए पोषण और मानसिक सहयोग जैसी समस्याएँ आज भी मौजूद हैं। इसके अलावा खेलों को करियर के रूप में अपनाने को लेकर समाज में अभी भी एक संकोच देखने को मिलता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम खेलों को केवल शौक या समय बिताने का साधन न मानकर उसे पेशेवर दृष्टिकोण से देखें। जब माता-पिता और समाज खेलों को पढ़ाई जितना ही महत्व देंगे, तभी वास्तविक बदलाव संभव होगा।

राष्ट्रीय खेल दिवस का संदेश यही है कि खेल किसी भी राष्ट्र की आत्मा होते हैं। जब देश का युवा स्वस्थ, आत्मविश्वासी और अनुशासित होगा, तभी वह समाज और राष्ट्र की प्रगति में योगदान दे सकेगा। खेल न केवल शारीरिक क्षमता को बढ़ाते हैं, बल्कि व्यक्ति को जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझना भी सिखाते हैं। एक खिलाड़ी जब मैदान में अपने प्रतिद्वंद्वी का सामना करता है, तो वह जीवन की चुनौतियों से भी जूझने की शक्ति अर्जित करता है। यही शक्ति किसी भी राष्ट्र को मजबूत बनाती है।

आज का भारत उस दिशा में अग्रसर है, जहाँ खेल केवल कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों तक सीमित न रहकर हर घर की पहचान बने। जब हर गली-मोहल्ले में बच्चे खेलेंगे, जब हर विद्यालय में खेल संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा, जब हर परिवार अपने बच्चों को खेलों के लिए प्रेरित करेगा, तभी भारत वास्तविक अर्थों में खेल महाशक्ति बनेगा। हमें यह समझना होगा कि पदक जीतना ही खेलों का अंतिम उद्देश्य नहीं है, बल्कि एक स्वस्थ और ऊर्जावान समाज का निर्माण ही इसका सबसे बड़ा लक्ष्य है।

इस राष्ट्रीय खेल दिवस पर हमें मेजर ध्यानचंद जैसे महान खिलाड़ियों की स्मृति को केवल औपचारिक श्रद्धांजलि तक सीमित न रखकर उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारना चाहिए। हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि खेलों को हम जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएँगे। जब पूरा राष्ट्र इस दिशा में आगे बढ़ेगा, तब भारत विश्व पटल पर न केवल आर्थिक और राजनीतिक शक्ति बनेगा, बल्कि खेल संस्कृति का भी केंद्र बनेगा। यही मेजर ध्यानचंद और अन्य महान खिलाड़ियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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