यह विडंबना ही है कि जिस महाराष्ट्र की धरती ने हिंदी को राजभाषा बनाने का विचार दिया, आज वहीं हिंदीभाषियों को अपमानित किया जा रहा है। महाराष्ट्र में हिंदीभाषियों के अपमान के पीछे दो तरह की राजनीति साफ़ दिखती है। एक तरफ़ अपमान करने वाली शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) है, तो दूसरी तरफ़ राज्य की सत्ता। हिंदीभाषियों को अपमानित करने वाली राजनीति का मक़सद हिंदी विरोध के नाम पर ‘मराठी मानुष’ की अवधारणा को आगे बढ़ाकर अपना वोट बैंक मज़बूत करना है। वहीं, सत्ता और विपक्ष के एक हिस्से की राजनीति अपमान करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने से इस डर से बच रही है कि कहीं इससे मराठी मानुष की धारणा कमज़ोर न हो जाए और उनका समर्थक आधार न खिसक जाए। इस राजनीतिक खींचतान में निम्न मध्यवर्गीय या हाशिए वाला हिंदीभाषी समुदाय ही पिस रहा है। उनका ‘अपराध’ सिर्फ़ इतना है कि वे महाराष्ट्र में रहते हुए मराठी न बोलकर हिंदी बोल रहे हैं।
विरोध का कड़वा अतीत – हिंदी बोलने के लिए हिंदीभाषियों को प्रताड़ित करने वाली राजनीति का इतिहास भी ऐसा ही रहा है। शिवसेना का उभार पिछली सदी के साठ के दशक के आख़िरी वर्षों में मुंबई में मलयालम बोलने वालों के ख़िलाफ़ आंदोलन के बाद हुआ था। मनसे के कार्यकर्ता तो 2008-09 के दौरान केंद्रीय नौकरियों के लिए मुंबई में परीक्षा देने आए उत्तर भारतीय, ख़ासकर उत्तर प्रदेश-बिहार के छात्रों को खुलेआम पीटते रहे। उस समय की राज्य सरकार ने भी इस बदसलूकी के ख़िलाफ़ प्रभावी कदम उठाने से परहेज किया था, और आज की सरकार का रवैया भी कुछ वैसा ही है। महाराष्ट्र में ‘मराठी मानुष’ का बोध इतना गहरा है कि सरकारें किसी भी दल की हों, इस मसले पर लगभग एक जैसा रुख़ अपनाती हैं।
हिंदी के लिए महाराष्ट्र का ऐतिहासिक योगदान – भारत की संपर्क भाषा और राजभाषा के रूप में हिंदी को स्थापित करने में महाराष्ट्र की हस्तियों का बड़ा योगदान रहा है। लोकमान्य तिलक ने 1905 में बंग-भंग के समय वाराणसी की यात्रा के दौरान नागरी प्रचारिणी सभा में कहा था, “निःसंदेह हिंदी ही देश की संपर्क और राजभाषा हो सकती है।” लोकमान्य अकेले ऐसे मराठी नहीं थे जिन्होंने हिंदी को लेकर यह विचार दिया। 1880 में गुजराती कवि नर्मद कवि ने भी लोकमान्य से क़रीब चौथाई सदी पहले हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में आगे लाने का सुझाव दिया था।
महात्मा गांधी की हिंदी को स्थापित करने की कोशिशों से कौन इनकार कर सकता है! 1918 में गांधी जी की अध्यक्षता में हुए इंदौर के हिंदी साहित्य सम्मेलन को हर हिंदी प्रेमी जानता है। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि गांधी जी ने 1917 में भरूच में आयोजित गुजरात शैक्षिक सम्मेलन में पहली बार सार्वजनिक तौर पर हिंदी की ताकत को स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था, “भारतीय भाषाओं में केवल हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसे राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया जा सकता है।” हिंदी के प्रचार को राष्ट्रीय कार्यक्रम मानने वाले काका कालेलकर भी मराठी भाषी ही थे। सतारा में जन्मे कालेलकर ने 1938 में कहा था, ‘राष्ट्रभाषा प्रचार हमारा राष्ट्रीय कर्म है।’ रचनात्मक आंदोलनकारी और गांधी जी के शिष्य विनोबा भावे भी ताउम्र हिंदी के लिए संघर्षरत रहे। उन्होंने हर भारतीय भाषा को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए हर भाषा से नागरी लिपि अपनाने का सुझाव दिया था।
सिर्फ़ राजनीति ही नहीं, पत्रकारिता जगत की मराठीभाषी हस्तियों ने भी हिंदी को स्थापित करने में रचनात्मक भूमिका निभाई है। माधव राव सप्रे, बाबूराव विष्णुराव पराड़कर, रामकृष्ण खाडिलकर, लक्ष्मण नारायण गर्दे जैसे पत्रकारों ने हिंदी को नई शैली में गढ़ा, उसके शब्द गढ़े और उसे ऊंचाई दी। हिंदी इन मराठीभाषी महापुरुषों की शुक्रगुजार है। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से निकले ‘धर्मयुग’ ने दशकों तक हिंदीभाषी पाठकों के दिलों पर राज किया। ऐसे महाराष्ट्र की धरती पर अगर हिंदी बोलने वालों का अपमान होता है, तो यह दुखद ही कहा जाएगा।
हिंदी विरोध की जड़ें और मौजूदा राजनीति – हिंदी को लेकर महाराष्ट्र की धरती पर अतीत में ऐसी सोच नहीं रही है। हिंदी विरोध की भावना तमिलनाडु में आज़ादी से पहले से ही रही है, जिसका संक्रमण कर्नाटक तक पहुँचा है। कर्नाटक रक्षण वेदिके ने 2017 में ‘हिंदी बेड़ा अभियान’ (हिंदी विरोधी अभियान) चलाया। 2019 में हिंदी दिवस न मनाने के लिए भी राज्य में अभियान चला। शुरू में इन विरोध प्रदर्शनों को बड़ा समर्थन नहीं मिला, लेकिन ऐसे आंदोलनों का असर बाद में दिखता है, जब विरोध की विचारधारा के असर में ज़मीनी स्तर की सोच बदलने लगती है। किसी राष्ट्रीयकृत बैंक की स्थानीय शाखा के प्रबंधक से ज़बरदस्ती हिंदी बोलने के लिए बहस करना हो या फिर किसी ऑटो वाले का हिंदीभाषी लड़की को थप्पड़ मारना, ये कर्नाटक में हिंदी विरोधी आंदोलन की ज़मीनी परिणति ही कहा जाएगा।
महाराष्ट्र का विदर्भ इलाका राज्य पुनर्गठन से पहले मध्य प्रांत और बरार का हिस्सा रहा, इस वजह से विदर्भ भी मोटे तौर पर हिंदी के प्रभाव वाला क्षेत्र है। शायद यही वजह रही कि महाराष्ट्र में हिंदी को लेकर विवाद नहीं रहा। विवाद की वजह अब मनसे और शिवसेना की राजनीति बनी है। इसका कारण नई शिक्षा नीति का वह प्रावधान है, जिसके तहत प्राथमिक स्तर पर भारतीय भाषाओं के ज़रिए शिक्षा देने का प्रावधान है। जब प्राथमिक स्तर पर हिंदी में पढ़ाई कराने का आदेश आया तो राज्य की राजनीति में अपनी जगह खोज रहे शिवसेना (उद्धव गुट) और मनसे को हिंदी विरोध में ही अपना भविष्य नज़र आया। एकनाथ शिंदे के अलग होने के बाद से शिवसेना (उद्धव गुट) भी परेशान है और शिवसेना से अलग होने के बाद से मनसे प्रमुख राज ठाकरे भी अपने राजनीतिक वजूद की तलाश में हैं। दिलचस्प यह भी है कि अतीत में सत्ता और उत्तराधिकार के चलते अलग राह चुनने वाले दोनों चचेरे भाई उद्धव और राज एक ही नाव पर सवार होने की तैयारी में हैं, और उसके लिए उन्होंने हिंदी विरोध की नाव तैयार की है।
हिंदी विरोध को लेकर सवाल यह भी है कि राज ठाकरे की ‘मराठी मर्द’ वाली ताकत हज़ारों करोड़ का कारोबार करने वाली हिंदी फ़िल्मों के गढ़ में जाने से क्यों हिचकती है? कर्नाटक हो या तमिलनाडु, वहाँ के भी फ़िल्म निर्माताओं को जब सौ, दो सौ या पांच सौ करोड़ क्लब में शामिल होना होता है, हिंदी के बाज़ार पर ही उनका ध्यान जाता है। हिंदी के बाज़ार से प्यार और हिंदीभाषियों से दुर्व्यवहार— दोनों एक साथ नहीं चल सकते। जिस तरह का व्यवहार हिंदीभाषियों के साथ हिंदी विरोध के नाम पर हो रहा है, अगर वैसा ही व्यवहार इन राज्यों के निवासियों के साथ हिंदीभाषी इलाकों में होने लगे तो क्या होगा? राजनीति को इस पर भी सोचना होगा। हिंदी को संपर्क भाषा इसलिए स्वीकार किया गया, क्योंकि वह देश को जोड़ने की कूव्वत रखती है। जबकि आज की राजनीति अपनी स्थानीय भाषाओं के नाम पर जिस भावना को फैला रही है, उससे देश का मानस बंटेगा… मानस बंटेगा तो देश में विघटन की प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सकता है। राजनीति चाहे जिस पक्ष की हो, उसे इस नज़रिए से हिंदी के विरोध को देखना होगा।





