प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक नेतृत्व में भारत को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। एक तरफ जहां उन्होंने अब तक 17 देशों की संसदों को संबोधित कर भारत की आवाज़ को विश्व मंच पर बुलंद किया है, वहीं दूसरी ओर 27 देशों से मिले सर्वोच्च नागरिक सम्मानों ने उन्हें दुनिया के सबसे सम्मानित और प्रभावशाली नेताओं में से एक बना दिया है। ये उपलब्धियां सिर्फ व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत का सीधा प्रतिबिंब हैं।

संसदों में संबोधन: सिर्फ भाषण नहीं, रणनीतिक कूटनीति – प्रधानमंत्री मोदी का दूसरे देशों की संसदों में संबोधन केवल औपचारिक भाषण नहीं होते, बल्कि ये रणनीतिक कूटनीति का अहम हिस्सा हैं। उन्होंने विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों के विधायी मंचों पर भारत की लोकतांत्रिक विरासत, आर्थिक दृष्टिकोण और वैश्विक सहयोग की भावना को साझा किया है।

अगर हम प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अन्य देशों की संसदों में दिए गए संबोधनों को याद करें, तो 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया, फिजी, भूटान, नेपाल की संसदों को संबोधित किया। 2015 में ब्रिटेन, श्रीलंका, मंगोलिया, अफगानिस्तान और मॉरीशस की संसद में उनकी आवाज़ गूँजी। 2016 में उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित किया। 2018 में युगांडा और 2019 में मालदीव की संसद में भी उनका संबोधन हुआ।

सबसे ख़ास बात, 2023 में प्रधानमंत्री मोदी ने दूसरी बार अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित किया, और इसके साथ ही वह उन चुनिंदा वैश्विक हस्तियों में शामिल हो गए जिन्हें दो बार अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करने का गौरव मिला है। इसके बाद 2024 में उन्होंने गुयाना और 2025 में घाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, साथ ही नामीबिया की संसदों को संबोधित किया। 2025 में एक हफ्ते के भीतर तीन देशों की संसदों में उनका संबोधन अपने आप में एक और कीर्तिमान है। इन सभी संबोधनों में भारत ने ग्लोबल साउथ, संयुक्त राष्ट्र सुधार, आतंकवाद विरोध, जलवायु न्याय और डिजिटल समावेशन जैसे मुद्दों पर अपना स्पष्ट दृष्टिकोण रखा है।

देश का गौरव बढ़ा रहे हैं पीएम मोदी के सम्मान – प्रधानमंत्री को मिले 27 देशों के सर्वोच्च सम्मानों पर गौर करें तो उन्हें यूएई का “Order of Zayed”, रूस का “Order of St. Andrew”, अमेरिका का “Legion of Merit”, फ्रांस का “Grand Cross of the Legion of Honour”, सऊदी अरब का “King Abdulaziz Sash”, बांग्लादेश का “Liberation War Honour”, और अफ्रीकी व कैरिबियाई देशों से भी राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं।

ये सम्मान दिखाते हैं कि भारत की सॉफ्ट पावर, मज़बूत अर्थव्यवस्था, जीवंत लोकतंत्र और रणनीतिक संतुलनकारी भूमिका को दुनिया स्वीकार कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति पारंपरिक ‘गुटनिरपेक्षता’ से आगे बढ़कर “बहुध्रुवीय मित्रता” पर आधारित है। उन्होंने पश्चिमी शक्तियों से रिश्ते मज़बूत किए, लेकिन साथ ही अफ्रीका, मध्य एशिया, खाड़ी देशों और दक्षिण अमेरिका में भी नए रणनीतिक संबंध बनाए हैं। मोदी की यह अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि भारत की उभरती शक्ति, विचारधारा और नेतृत्व क्षमता की स्वीकार्यता है। उनका हर संसद में दिया गया संबोधन, हर प्राप्त सम्मान, भारत की लोकतांत्रिक आत्मा, विकासशील दृष्टिकोण और नैतिक शक्ति का प्रतीक है। ये सब भारतीय विदेश नीति के इतिहास में एक अभूतपूर्व अध्याय लिखते हैं। यह दर्शाता है कि आज का भारत केवल सुनने वाला नहीं, बल्कि दुनिया को दिशा देने वाला देश बन चुका है। यह उपलब्धि भारतवासियों के आत्मविश्वास, आकांक्षाओं और अंतरराष्ट्रीय भूमिका को सशक्त करती है।

पीएम मोदी के उपहारों में झलकती है भारत की आत्मा –प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्व यात्राओं की चर्चा अक्सर उनकी रणनीतिक कूटनीति और वैश्विक नेतृत्व के संदर्भ में होती है, लेकिन इन यात्राओं में एक और ख़ास पहलू है जो चुपचाप भारत की आत्मा को विश्व के सामने प्रस्तुत करता है – वह हैं उनके द्वारा चुने गए सांस्कृतिक उपहार

हर दौरे में प्रधानमंत्री मोदी जो विशिष्ट हस्तशिल्प, कलाकृतियां और प्रतीक उपहार के तौर पर ले जाते हैं, वे सिर्फ़ शिष्टाचार नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध परंपरा, बहुरंगी संस्कृति और आत्मनिर्भर कलात्मकता के परिचायक होते हैं। यह सांस्कृतिक कूटनीति भारत की सॉफ्ट पावर को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। प्रधानमंत्री मोदी जिन वस्तुओं को विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को भेंट करते हैं, वे भारत के अलग-अलग राज्यों, जनजातियों, परंपराओं और शिल्प कलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके उपहार केवल भारत की कलाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम भी हैं। ये दर्शाते हैं कि भारत केवल तकनीक और व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि हज़ारों साल पुरानी सभ्यता का जीवंत प्रतिनिधि है। इन उपहारों के चर्चित होने से संबंधित हस्तशिल्प की मांग और मूल्य दोनों बढ़ते हैं, और ‘मेक इन इंडिया’ व ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसी नीतियों को सांस्कृतिक स्तर पर मजबूती मिलती है।

प्रधानमंत्री मोदी और प्रवासी भारतीय समुदाय – जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी देश की यात्रा पर जाते हैं, तो उनकी पहली प्राथमिकता होती है— वहाँ बसे भारतीय समुदाय से संवाद। ये मुलाकातें केवल भावनात्मक संबंधों का प्रदर्शन नहीं बल्कि नागरिक जुड़ाव का शक्तिशाली प्रतीक बन चुकी हैं। प्रवासी भारतीयों द्वारा अपने सांस्कृतिक प्रदर्शन, लोककला, संगीत और पारंपरिक वेशभूषा के माध्यम से जो दृश्य बनता है, वह विश्व के सामने भारत की एकता में विविधता और जीवंत परंपरा का संदेश देता है।

प्रधानमंत्री मोदी जब इन समुदायों से मिलते हैं, तो वह यह स्पष्ट करते हैं कि वे भारत के गौरव के वाहक हैं, वे भारत और दुनिया के बीच सांस्कृतिक पुल हैं, और वे भारत की सॉफ्ट पावर के सशक्त स्रोत हैं। उनकी प्रत्येक विदेश यात्रा में भारतीय समुदाय द्वारा प्रस्तुत नृत्य, संगीत, भजन, पारंपरिक वेशभूषा में स्वागत, और भाषणों में ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष, ये सब सिर्फ़ रस्म अदायगी नहीं होते। ये दिखाते हैं कि भारत कहीं भी जाए, अपनी संस्कृति को जीवंत रखता है, भारत की परंपरा आधुनिकता के साथ सह-अस्तित्व में है, और भारत की ‘संवेदनशीलता’ और ‘संपर्क’ की नीति भावनात्मक संबंधों पर आधारित है।

प्रधानमंत्री मोदी का भारतीय समुदाय से संवाद और प्रवासी भारतीयों का उनके समक्ष अपनी संस्कृति का प्रदर्शन, एक सशक्त और गहरा वैश्विक संदेश देता है कि भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक संस्कार, विचार और परंपरा है, जो सीमाओं से परे जाकर भी जीवित रहती है। यह ‘एक भारत, वैश्विक भारत’ की संकल्पना को मज़बूत करता है और दुनिया को बताता है कि भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभर रहा है जिसकी मूल्य आधारित कूटनीति, संस्कृति आधारित संवाद और नागरिक भागीदारी आधारित पहचान है।

बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय विदेश नीति को पारंपरिक निष्क्रियता से निकाल कर सक्रिय, निर्णायक और बहुआयामी कूटनीति का रूप दिया है। उनकी रणनीति केवल राजनयिक संवादों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने भारत को एक निर्णायक और आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है।

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