वाराणसी : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी दौरे से पहले शहर का सियासी पारा चढ़ गया है। प्रशासन ने सुरक्षा के नाम पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के दर्जनों नेताओं को या तो हिरासत में ले लिया है या उनके घरों में नज़रबंद कर दिया है। यह कार्रवाई उन विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए की गई है, जिसकी तैयारी विपक्षी नेता कर रहे थे।
विरोध की तैयारी, पुलिस की कार्रवाई – प्रधानमंत्री के आगमन से पहले, पुलिस ने कांग्रेस और सपा के कई प्रमुख नेताओं को निशाना बनाया। कांग्रेस के जिलाध्यक्ष राजेश्वर सिंह पटेल और महानगर अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे को हिरासत में लिया गया, जबकि युवा कांग्रेस के प्रदेश सचिव सुजान खान को घर पर ही नज़रबंद कर दिया गया। इसी तरह, समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष सुजीत यादव ‘लक्कड़ पहलवान’ और अन्य नेताओं को भी उनके घरों में रोक दिया गया है।
अधिकारियों का कहना है कि यह कदम शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाया गया है, लेकिन विपक्षी दलों का आरोप है कि यह लोकतंत्र की आवाज़ को दबाने का प्रयास है।
विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया – कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने इस कार्रवाई पर कड़ा रुख़ अपनाया है। उन्होंने कहा, “पुलिस भेजकर हमें रोकना, कार्यकर्ताओं की आवाज़ दबाना लड़ाई को रोक नहीं पाएगा। कांग्रेस का हर बब्बर शेर गली-गली, गांव-गांव से आवाज़ उठाएगा।” अजय राय ने यह भी कहा कि इस तरह की दमनकारी नीति लोकतंत्र के लिए खतरा है।
सपा नेताओं ने भी इस कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा कि सरकार विपक्ष को अपनी बात रखने से रोकना चाहती है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या विरोध प्रदर्शन करना एक लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है?
सियासी माहौल में गरमाहट – पीएम मोदी के दौरे से पहले जिस तरह से विपक्षी नेताओं को रोका गया है, उससे वाराणसी का सियासी माहौल गर्म हो गया है। एक तरफ जहाँ प्रशासन सुरक्षा को लेकर सतर्कता दिखा रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहे हैं।
यह घटना दर्शाती है कि जब भी बड़े राजनेताओं के दौरे होते हैं, तो सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच एक तनाव पैदा हो जाता है। क्या वाकई इस तरह की कार्रवाई से लोकतंत्र की जड़ें कमज़ोर होती हैं, या यह सिर्फ़ शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़रूरी है? यह सवाल बहस का विषय बना हुआ है।





