PWD ने खोला ‘कैम्प’: मुआवज़े के लिए ज़मा करें दस्तावेज़

varanasi news: वाराणसी: दालमण्डी—बनारस की वह गलियां जो हमेशा अपनी रौनक और इतिहास के लिए जानी जाती हैं, आज एक अलग ही ‘टेंशन’ में हैं। वजह है सड़क चौड़ीकरण का एक बड़ा प्रोजेक्ट। जी हां, शहर के चौक थाना क्षेत्र में पड़ने वाली इस मशहूर दालमण्डी सड़क के चौड़ीकरण का मामला आजकल सुर्खियों में छाया हुआ है।

एक तरफ जहां प्रशासन इस सड़क को चौड़ा करके विकास की राह खोलना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ दालमण्डी के व्यापारी इस कदम का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। मामला इतना पेचीदा हो गया है कि अब यहां निशानदेही (मार्किंग) का काम भी शुरू हो चुका है, ताकि पता चल सके कि किसे कितनी जगह छोड़नी पड़ेगी।

मुआवज़ा मिला, तो किसी को ‘स्टे’ – इस पूरे प्रकरण को दिलचस्प बना रही हैं दो अलग-अलग तरह की खबरें। चर्चाओं पर यकीन करें तो दालमण्डी के कुछ भवन स्वामियों ने तो प्रशासन से मुआवजे की राशि खुशी-खुशी प्राप्त भी कर ली है। यानी उन्होंने विकास के इस कदम का स्वागत किया है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। कुछ अन्य भवन स्वामियों ने इस चौड़ीकरण के विरोध में अपनी लड़ाई को अदालत तक पहुंचा दिया है और उन्होंने उच्च न्यायालय से स्थगनादेश (Stay Order) भी प्राप्त कर लिया है। इसका मतलब है कि फिलहाल उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। यह स्थिति प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है—कोई साथ है, तो कोई विरोध में खड़ा है।

PWD ने खोला ‘कैम्प’: मुआवज़े के लिए ज़मा करें दस्तावेज़ – इन्हीं खींचतान भरे माहौल के बीच एक ज़रूरी कदम उठाया गया है। अधिशासी अभियन्ता, प्रान्तीय खण्ड, लोक निर्माण विभाग (PWD) वाराणसी ने दालमण्डी के गुदड़ी स्कूल में अपना कैम्प कार्यालय खोल दिया है।

यहां एक बड़ा बैनर लगाया गया है जो स्थिति को साफ करता है। बैनर पर लिखा है: “जनपद वाराणसी में दालमण्डी मार्ग के चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण का कार्य दिनांक 25 सितम्बर 2025 से परियोजना पूर्ण होने तक भूमि/भवन के प्रतिकर भुगतान हेतु अभिलेख जमा करने के सम्बन्ध में।”

यह स्पष्ट संकेत है कि प्रशासन अब तेज़ी से उन लोगों को मुआवज़ा (प्रतिकर) देना चाहता है जिन्होंने अधिग्रहण को स्वीकार कर लिया है। अब देखना यह होगा कि इस कैम्प कार्यालय के खुलने और मुआवज़े के भुगतान की प्रक्रिया शुरू होने के बाद दालमण्डी के विरोध की आग कितनी धीमी पड़ती है।

दालमण्डी की यह सड़क चौड़ी होगी या नहीं, और होगी तो कब तक? यह गुत्थी अभी भी बनारस के गलियारों में उलझी हुई है। इस पर हमारी नज़र बनी रहेगी।

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