काशी के मणिकर्णिका घाट पर रगंभरी एकादशी के दुसरे दिन महामशान पर खेली गई चीता भस्म की होली। जानिए बाबा महाश्मशान नाथ की इस अद्भुत और अलौकिक परंपरा के बारे में विस्तार से।

वाराणसी: धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में होली का रंग सबसे अलग और निराला होता है। जहाँ पूरी दुनिया रंगों और गुलाल से होली खेलती है, वहीं महादेव की नगरी में रगंभरी एकादशी के दुसरे दिन महामशान मणिकर्णिका घाट पर खेली गई चीता भस्म की होली ने एक बार फिर दुनिया को साश्वत सत्य से रूबरू कराया। यह दृश्य इतना अलौकिक था कि देखने वालों की रूह तक शिवमय हो गई।

मृत्यु के आंगन में गूंजी शहनाई की मंगल ध्वनि – सुबह से ही शिव भक्त दुनिया की इस सबसे दुर्लभ और अद्भुत होली की तैयारी में जुट गए थे। मणिकर्णिका घाट, जहाँ आमतौर पर अपनों से बिछड़ने का गम और सन्नाटा पसरा रहता है, वहां आज शहनाई की मंगल ध्वनि गूंज रही थी। रगंभरी एकादशी के दुसरे दिन महामशान मणिकर्णिका घाट पर खेली गई चीता भस्म की होली के दौरान हर शिवगण खुद को इस दिव्य दृश्य में आत्मसात करने के लिए आतुर दिखा।

क्यों खेली जाती है मशान की होली? – मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता पार्वती का गौना (विदाई) कराकर काशी लाते हैं। इस उत्सव में देवी-देवता और मनुष्य तो शामिल होते हैं, लेकिन बाबा के प्रिय गण—भूत, प्रेत, पिशाच और दृश्य-अदृश्य शक्तियां—छूट जाती हैं। अपने इन प्रिय गणों के साथ खुशियां बांटने के लिए स्वयं महादेव मणिकर्णिका तीर्थ पर मध्याह्न स्नान के बाद भस्म की होली खेलने आते हैं।

अव्यवस्था के बावजूद अटूट रही श्रद्धा – इस वर्ष मणिकर्णिका घाट पर चल रहे नवनिर्माण कार्य के कारण भक्तों को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भारी पुलिस बल और बैरिकेटिंग की वजह से कई शिव भक्तों को ललिता और सिंधिया घाट पर ही रोक दिया गया, जिससे श्रद्धालुओं में थोड़ी निराशा भी दिखी। हालांकि, धैर्य रखने वाले भक्तों को दोपहर 2 बजे के बाद बाबा महाश्मशान नाथ जी को भस्म अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

गुलशन कपूर ने दी इस परंपरा को भव्यता – बाबा महाश्मशान नाथ मंदिर के व्यवस्थापक काशीपुत्र गुलशन कपूर पिछले 26 वर्षों से इस अनादि परंपरा को विश्व पटल पर लाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह होली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम सत्य का स्वीकार है।

“बाबा तो सबका बेड़ा पार लगाने वाले हैं, वो अपनों की खुशियों का ध्यान कैसे न रखते? इसीलिए वे स्वयं मशान आकर अपने गणों के साथ होली खेलते हैं।” — गुलशन कपूर

उत्सव की शुरुआत में गुलशन कपूर ने बाबा महाश्मशान नाथ और माता मशान काली (शिव-शक्ति) की मध्याह्न आरती की। बाबा को जया, विजया, मिष्ठान और सोमरस का भोग लगाया गया। माता मशान काली को लाल गुलाल चढ़ाकर होली का शुभारंभ हुआ, जिसके बाद पूरा घाट भस्म के सफेद बादलों से ढक गया।

इस वर्ष के आयोजन में मुख्य रूप से शामिल हुए अघोर पीठाधीश्वर कपाली बाबा जी महाराज, गुलशन कपूर (मंदिर व्यवस्थापक), सात्विक शुक्ला (प्रधान पुजारी, माँ पीताम्बरा मंदिर), स्वामी भारती महाराज (राज राजेश्वरी मंदिर), प. विजय शंकर पांडेय, अतुल झीगरन, अजय चौबे, सोनू कपूर एवं अन्य गणमान्य भक्त।

रगंभरी एकादशी के दुसरे दिन महामशान मणिकर्णिका घाट पर खेली गई चीता भस्म की होली यह संदेश देती है कि शिव ही सत्य हैं और मृत्यु भी एक उत्सव है। जलती चिताओं के बीच खेली जाने वाली यह होली न केवल काशी की विशिष्टता है, बल्कि यह दुनिया भर के लोगों को जीवन और मृत्यु के बीच के अद्भुत संतुलन का दर्शन कराती है।

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