वाराणसी। जनपद के न्याय क्षेत्र से एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। न्यायालय विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) वाराणसी की अदालत ने एक परिवाद में वादिनी के प्रार्थना पत्र को किया खारिज कर दिया है। यह प्रार्थना पत्र लालपुर पाण्डेयपुर वाराणसी थाना क्षेत्र से संबंधित था, जिसमें वादिनी ने विपक्षियों पर फर्जी कूटरचित दस्तावेज बनाने और जातिसूचक शब्दों के प्रयोग का आरोप लगाया था।
क्या था वादिनी का आरोप? – लालपुर पाण्डेयपुर वाराणसी निवासिनी श्रीमती छाया पत्नी स्व. कणाद द्वारा विपक्षियों – लेलिन रघुवंशी, राहुल रघुवंशी, चेग्वारा रघुवंशी व सयुग्वा रैक्व – के खिलाफ न्यायालय में धारा 173 (4) बीएनएसएस के तहत प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया था।
वादिनी ने अपने प्रार्थना पत्र में मुख्य रूप से दो आरोप लगाए थे:
- संपत्ति विवाद व फर्जी कूटरचित दस्तावेज: विपक्षीगणों द्वारा फर्जी कूटरचित दस्तावेज व अन्य प्रपत्रों में हेराफेरी करते हुए उनकी मर्जी के बिना संपत्ति के नामान्तरण की कार्यवाही की जा रही है।
- जातिसूचक अपमान: विरोध करने पर विपक्षियों द्वारा जातिसूचक शब्दों से अपमानित करने व जातिसूचक गाजी (गाली) दी जा रही है। साथ ही प्रार्थिनी को उसके विधिक हक व अधिकार से वंचित रखा जा रहा है।
यह विवाद मुख्य रूप से संपत्ति व एससी/एसटी एक्ट से जुड़ा हुआ बताया गया था।
विपक्षियों का पक्ष: अधिवक्ता विनय त्रिपाठी व सुजीत गौतम की मजबूत दलीलें – न्यायालय में विपक्षियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विनय त्रिपाठी व सुजीत गौतम ने मजबूत पैरवी की और अपना पक्ष रखा। विनय त्रिपाठी व सुजीत गौतम द्वारा दिनांकित 13/10/2025 को अदालत में आपत्ति पेश की गई। आपत्ति में यह आरोप लगाया गया कि वादिनी का प्रार्थना पत्र “बिल्कुल ही मनगढ़ंत, बेबुनियाद आधार पर मात्र परेशान व ब्लैकमेल करने की गरज से दाखिल किया गया है जो खारिज करने योग्य है।” विपक्षियों ने यह भी बताया कि वादिनी, उनके भाई कणाद की पत्नी हैं, और कणाद ने अपनी पत्नी की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर लिया था। अधिवक्ता विनय त्रिपाठी व सुजीत गौतम ने तर्क दिया कि वादिनी द्वारा लगाए गए सभी आरोप गलत और बेबुनियाद हैं।
न्यायालय का अंतिम निर्णय: प्रार्थना पत्र को किया खारिज – दोनों पक्षों की दलीलों और प्रस्तुत साक्ष्यों के अवलोकन के बाद, न्यायालय विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) ने अपना महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया।
न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि:
“उपरोक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों में प्रकरण के समग्र रूप से परिशीलनोपरांत विपक्षीगण को भा.द.सं. एवं अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अंतर्गत किसी धारा में बतौर अभियुक्त तलब किये जाने का प्रथम दृष्टया आधार नहीं है।”
तदनुसार, न्यायालय ने वादिनी के प्रार्थना पत्र को किया खारिज करते हुए परिवाद अंतर्गत धारा 203 दं.प्र.सं. को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने पत्रावली को नियमानुसार दाखिल दफ्तर करने का आदेश दिया। इस निर्णय ने लालपुर पाण्डेयपुर वाराणसी क्षेत्र के इस विवादित मामले में विपक्षियों को बड़ी राहत प्रदान की।
यह फैसला दर्शाता है कि एससी/एसटी एक्ट जैसे महत्वपूर्ण कानूनों का दुरुपयोग करने के प्रयासों को न्यायालय गंभीरता से लेता है और साक्ष्यों के अभाव में सख्त कार्रवाई करता है।







