बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ताओं शशांक शेखर त्रिपाठी, जितेंद्र तिवारी, राजेश त्रिवेदी और आशुतोष शुक्ला ने संयुक्त रूप से मोर्चा संभाला।

शादी का झांसा देकर संबंध बनाने में आरोपी की जमानत मंजूर करते हुए वाराणसी की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक उदाहरण पेश किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति और साक्ष्यों का सूक्ष्म परीक्षण जमानत के लिए अनिवार्य है।

वाराणसी न्यायालय का विस्तृत और कारणयुक्त आदेश वाराणसी के चर्चित आपराधिक प्रकरण में माननीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश / विशेष न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम), वाराणसी ने 27 फरवरी 2026 को आरोपी अनुज राजभर की जमानत अर्जी स्वीकार कर ली। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69, 351(2) और 352 के तहत पंजीकृत था। मुख्य आरोप यह था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर संबंध बनाए थे। न्यायालय ने अपने आदेश में अभियोजन के कथनों और उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित नज़ीरों का गहराई से तुलनात्मक परीक्षण किया।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं की संयुक्त और दमदार दलीलें – बचाव पक्ष की ओर से वाराणसी के दिग्गज अधिवक्ताओं—शशांक शेखर त्रिपाठी, जितेंद्र तिवारी, राजेश त्रिवेदी और आशुतोष शुक्ला ने संयुक्त रूप से मोर्चा संभाला। बचाव पक्ष की दलीलों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे: सहमति (Consent) का प्रश्न: अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि कथित संबंध लंबे समय तक चले, जो प्रथम दृष्टया आपसी सहमति की ओर इशारा करते हैं। तथ्यात्मक भ्रांति (Misconception of Fact): सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि हर मामले को ‘धोखा’ नहीं माना जा सकता जब तक कि यह साबित न हो कि सहमति पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं थी। साफ छवि: आरोपी का कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है और वह पहले से ही न्यायिक अभिरक्षा में है। संवैधानिक अधिकार: अधिवक्ताओं ने जोर दिया कि “जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद”, विशेषकर तब जब ट्रायल अभी लंबित हो।

न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और शर्तें साक्ष्यों और परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री फिलहाल जमानत रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। शादी का झांसा देकर संबंध बनाने में आरोपी की जमानत मंजूर करते हुए कोर्ट ने ये शर्तें रखीं: मुचलका: आरोपी को एक लाख रुपये के निजी मुचलके और समान राशि के जमानतदार पर रिहा किया जाए। साक्ष्यों की सुरक्षा: आरोपी केस से जुड़े किसी भी साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा। गवाहों पर दबाव: गवाहों को प्रभावित करने की किसी भी कोशिश पर जमानत रद्द की जा सकती है। यात्रा प्रतिबंध: बिना न्यायालय की अनुमति के आरोपी देश छोड़कर नहीं जाएगा।

    “अभियोजन को अपराध के प्रत्येक आवश्यक घटक को ठोस साक्ष्यों के साथ सिद्ध करना होगा। वर्तमान परिस्थितियों में आरोपी को सलाखों के पीछे रखना न्यायोचित नहीं प्रतीत होता।”न्यायालय की टिप्पणी

    विधि विशेषज्ञों का मानना है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम का यह निर्णय संतुलित न्यायशास्त्र का एक बेहतरीन उदाहरण है। यह आदेश दर्शाता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाना कितना आवश्यक है। जमानत मिलने के बाद आरोपी के परिजनों ने चारों वरिष्ठ अधिवक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया है। वाराणसी के प्रशासनिक और विधिक गलियारों में इस फैसले की काफी चर्चा हो रही है।

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