वाराणसी: शिक्षक दिवस का दिन, शिक्षा और शिक्षकों को समर्पित होता है। इसी पावन अवसर पर वाराणसी में एक ऐसा ही भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसने शिक्षा के महत्व को एक बार फिर से स्थापित किया। ब्रह्मराष्ट्र एकम् द्वारा निवेदिता बालिका शिक्षा सदन, मोतिझील तुलसीपुर में आयोजित इस सम्मान समारोह में लगभग 200 शिक्षकों को सम्मानित किया गया। यह सम्मान सिर्फ शॉल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समाज और राष्ट्र निर्माण में उनके अमूल्य योगदान के प्रति सच्ची श्रद्धा थी।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लोकप्रिय विधायक सौरभ श्रीवास्तव ने शिक्षकों को राष्ट्र की रीढ़ बताया, जो बिल्कुल सच है। एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब उसकी शिक्षा व्यवस्था सशक्त हो और उसे गढ़ने वाले शिक्षक समर्पित हों।

“शिक्षक राष्ट्र के कुम्हार हैं” कार्यक्रम में पूज्य महाराज श्री श्री 1008 डॉ. सचिन्द्र नाथ महाराज का उद्बोधन बेहद प्रेरक था। उन्होंने शिक्षकों की तुलना कुम्हार से करते हुए कहा कि जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी को तराशकर सुंदर और उपयोगी पात्र बनाता है, उसी प्रकार शिक्षक अपने छात्रों को तराशकर उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और समाज का एक बेहतर इंसान बनाते हैं।

उन्होंने आज की शिक्षा में नैतिक मूल्यों की कमी पर चिंता व्यक्त की और शिक्षकों से आग्रह किया कि वे बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान न दें, बल्कि उनके अंदर संस्कार और नैतिक शिक्षा का बीज भी बोएं। यही वो बीज है जो आगे चलकर एक सुंदर और सशक्त राष्ट्र का विशाल वृक्ष बनेगा। उनका यह संदेश न केवल शिक्षकों के लिए था, बल्कि पूरे समाज के लिए था कि शिक्षा तभी पूरी होती है जब उसमें संस्कार और नैतिकता का समावेश हो।

पूज्य गुरुजी दिवाकर महाराज ने भी डॉ. सचिन्द्र नाथ महाराज के विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि शिक्षा में संस्कार और आत्मिक चेतना का संगम ही उसे सार्थक बनाता है। उन्होंने शिक्षकों को राष्ट्र के निर्माता कहते हुए इस प्रयास की सराहना की।

समाज के स्तंभों का समर्थन इस कार्यक्रम में शिक्षा और समाज सेवा से जुड़े कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे, जिनमें आकाश इंस्टिट्यूट से विष्णु देव तिवारी, सनबीम स्कूल से हर्ष मधोक और A+- educare के निदेशक आलोक श्रीवास्तव जैसे नाम शामिल थे। इन सभी की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम की गरिमा को और भी बढ़ा दिया।

इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में रोटारैक्ट क्लब के सदस्यों की भूमिका भी सराहनीय रही। उनके अथक प्रयास और समर्पण ने इस कार्यक्रम को ऐतिहासिक बना दिया।

शिक्षकों को शॉल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र भेंट कर उनका सम्मान किया गया, जो इस बात का प्रतीक था कि समाज और देश के निर्माण में उनका योगदान कितना महत्वपूर्ण है। यह समारोह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह एक संदेश था कि शिक्षक ही समाज की आत्मा हैं और उनकी प्रतिष्ठा ही राष्ट्र की प्रतिष्ठा है।

वाराणसी की धरती पर हुआ यह आयोजन एक ऐतिहासिक क्षण बन गया, जिसने शिक्षा के महत्व और शिक्षक समाज की प्रतिष्ठा को एक नई ऊंचाई दी।

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