वाराणसी में चैत्र नवरात्रि के अवसर पर बाबा महाश्मसान नाथ का त्रिदिवशीय श्रृंगार महोत्सव संपन्न। जानें क्यों नगर वधुएं जलती चिताओं के बीच नृत्य कर बाबा से मांगती हैं मोक्ष की दुआ।

वाराणसी (मणिकर्णिका घाट): धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर एक ऐसा दृश्य जीवंत हो उठा, जो पूरी दुनिया में केवल यहीं संभव है। वाराणसी चैत्र नवरात्रि के पंचमी से सप्तमी तक चलने वाले श्री श्री १००८ बाबा महाश्मसान नाथ जी का त्रिदिवशीय श्रृंगार महोत्सव का बुधवार, २५ मार्च २०२६ को भावपूर्ण समापन हुआ। समापन के दिन योगिनियों ने अपनी नित्यांजलि से महादेव को श्रद्धा सुमन अर्पित किए, जिससे मणिकर्णिका का ‘शवलोक’ साक्षात ‘शिवलोक’ में परिवर्तित हो गया।

तांत्रिक विधान से बाबा का भव्य श्रृंगार और भोग – महोत्सव के तृतीय एवं अंतिम दिवस पर बाबा महाश्मशान नाथ और माता मशान काली का विशेष पूजन किया गया। सायंकाल बाबा को पंचमकार का भोग लगाया गया और तांत्रिक विधान से भव्य आरती संपन्न हुई। मान्यता है कि आदि शक्ति ने बाबा को प्रसन्न करने के लिए स्वयं योगिनी रूप धरा था। आज बाबा का दरबार रजनीगंधा, गुलाब और सुगंधित फूलों की महक से सराबोर था।

‘अगला जन्म सुधारें बाबा’ – नगरवधुओं की मार्मिक भावांजलि – आरती के पश्चात काशी की परंपरा के अनुसार नगरवधुओं ने अपने गायन और नृत्य के माध्यम से बाबा के चरणों में हाजिरी लगाई। यह दृश्य अत्यंत भावुक कर देने वाला था जब नगरवधुओं ने नृत्य करते हुए बाबा से मन्नत मांगी कि “हे बाबा, इस जन्म के नरकीय जीवन से मुक्ति देकर हमारा अगला जन्म सुधार देना।” श्रद्धा और विश्वास के इस मिलन को देखकर वहां उपस्थित हर भक्त की आंखें डबडबा गईं।

राजा मानसिंह और इस परंपरा का सैकड़ों वर्षों का इतिहास – मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने इस ऐतिहासिक परंपरा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह प्रथा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।

“जब राजा मानसिंह ने बाबा महाश्मशान नाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था, तब हिंदू धर्म की परंपरा के अनुसार शुभ कार्य में संगीत का आयोजन होना था। लेकिन श्मशान की भयावहता के कारण कोई भी कलाकार वहां आने को तैयार नहीं हुआ। तब काशी की नगरवधुओं ने स्वयं राजा मानसिंह तक संदेश भिजवाया कि यदि उन्हें अवसर मिले, तो वे संगीत के जनक ‘नटराज’ को अपनी सेवा अर्पित करना चाहती हैं।”

राजा मानसिंह ने सहर्ष उन्हें आमंत्रित किया और तभी से यह परंपरा अटूट है। नगरवधुओं का मानना है कि महाश्मशान पर नृत्य करने से उन्हें समाज के तिरस्कार से मुक्ति और मोक्ष का मार्ग प्राप्त होगा।

जलती चिताओं के बीच गूंजे डमरू और भजन – स्वागत समारोह के बाद मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच स्थित मंदिर परिसर में रात्रि पर्यंत चलने वाला जागरण प्रारंभ हुआ। मंदिर व्यवस्थापक गुलशन कपूर और उपाध्यक्ष संजय प्रसाद गुप्ता ने अतिथियों का स्वागत किया। इसके बाद भजनों का सिलसिला शुरू हुआ : दुर्गा दुर्गति नाशिनी, दिमिग दिमिग डमरू कर बाजे, खेले मसाने में होरी, दादरा, ठुमरी और चैती की तानों ने भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। अंत में ‘ओम मंगलम ओंकार मंगलम’ और ‘बम लहरी’ जैसे भजनों पर पूरा श्मशान घाट शिव की भक्ति में झूम उठा।

आयोजन में शामिल प्रमुख व्यक्तित्व – इस भव्य महोत्सव को सफल बनाने में अध्यक्ष चैनू प्रसाद गुप्ता, महामन्त्री बिहारी लाल गुप्ता, महंत संजय झींगरन, विजय शंकर पांडे, दिलीप यादव, संजय गुप्ता, दीपक तिवारी, अजय गुप्ता, रिंकू पांडेय, मनोज शर्मा और विजय गुप्ता ‘विज्जु’ सहित भारी संख्या में शिव भक्त उपस्थित रहे।

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