सिगरा थाने के मामले में न्यायालय ने दी राहत, खुद किया था आत्मसमर्पण
न्यायालय में अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता नीरज पाण्डेय व सहयोगी श्रवण पाण्डेय ने पक्ष रखा
वाराणसी: न्यायालय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी से एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। सिगरा थाने में दर्ज मुकदमा संख्या 183/2020 के अभियुक्त मुकुल सोनकर को कोर्ट ने ज़मानत दे दी है। यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 (मारपीट), 504 (गाली-गलौज), और 506 (जान से मारने की धमकी) से संबंधित था।
क्या था मामला? – कोर्ट में पेश किए गए दस्तावेज़ों के अनुसार, मुकुल सोनकर पर मारपीट करने, गाली-गलौज देने और जान-माल की धमकी देने का आरोप था। इस मामले में पुलिस द्वारा आरोप-पत्र (Charge-sheet) पहले ही न्यायालय के समक्ष पेश किया जा चुका है।

अभियुक्त ने किया था आत्मसमर्पण – सबसे खास बात यह रही कि अभियुक्त मुकुल सोनकर ने स्वेच्छा से (खुद ही) न्यायालय के सामने आत्मसमर्पण किया था और तभी से वह न्यायिक हिरासत (judicial custody) में थे।
मुकुल सोनकर के अधिवक्ता ने ज़मानत के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। इस दौरान विद्वान अभियोजन अधिकारी ने ज़मानत का विरोध करते हुए कहा कि अभियुक्त ने खुद आत्मसमर्पण किया है और अपराध गैर-ज़मानती (non-bailable) है। न्यायालय में अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता नीरज पाण्डेय व सहयोगी श्रवण पाण्डेय ने पक्ष रखा।

कोर्ट ने क्यों दी ज़मानत? – दोनों पक्षों को सुनने और केस की फ़ाइल का अवलोकन करने के बाद, न्यायालय ने पाया कि अभियुक्त पहले ही स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करके न्यायिक हिरासत में है। अपराध की प्रकृति और सभी तथ्यों एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने माना कि मुकुल सोनकर की ज़मानत का आधार पर्याप्त है।
न्यायालय का आदेश – मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी ने आदेश दिया कि मुकुल सोनकर पुत्र छेदीलाल सोनकर को ₹20,000 के व्यक्तिगत बंधपत्र (Personal Bond) और इतनी ही धनराशि के दो प्रतिभू (Sureties) प्रस्तुत करने पर ज़मानत पर रिहा किया जाए।

विश्लेषण – इस तरह के मामलों में, यदि अभियुक्त खुद ही आत्मसमर्पण कर देता है, तो न्यायालय अक्सर उसकी परिस्थितियों और केस के रिकॉर्ड को देखते हुए ज़मानत पर विचार करता है। मुकुल सोनकर की रिहाई इस बात को दर्शाती है कि कोर्ट ने उनकी स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करने की कार्रवाई को सकारात्मक रूप में देखा है।




