वाराणसी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को भले ही ‘बेस्ट स्मार्ट सिटी’ का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला हो, लेकिन शहर के जमीनी हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। यहां स्मार्ट सिटी के नाम पर हुए 100 करोड़ रुपये से ज्यादा के काम बर्बाद हो चुके हैं, और अब यह शहर स्मार्ट कम और बदहाल ज्यादा दिख रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन पांच वार्डों को 75 करोड़ रुपये खर्च करके ‘स्मार्ट’ बनाया गया था, उनकी हालत आज बद से बदतर है। दीवारों पर बनी खूबसूरत पेंटिंग्स खराब हो चुकी हैं, सीवर और जल निकासी की व्यवस्था फेल है, और स्ट्रीट लाइटें भी अक्सर बंद रहती हैं। इतना ही नहीं, जो गुलाबी पत्थर इन वार्डों में लगाए गए थे, वे भी उखड़ने लगे हैं, जिससे शहर की सुंदरता के दावे खोखले नजर आते हैं।
स्मार्ट सिटी के कामों की बदहाली सिर्फ वार्डों तक सीमित नहीं है। करीब 25 करोड़ रुपये से सोनिया तालाब, पार्कों और कुंडों के सौंदर्यीकरण का काम कराया गया, लेकिन आज वे भी टूट-फूट का शिकार हैं। दशाश्वमेध प्लाजा पर लगी जाली टूटी पड़ी है, बैठने के लिए लगाए गए बेंच भी टूटे हुए हैं। राजेंद्र प्रसाद घाट जाने वाले रास्ते के पत्थर धंस चुके हैं, जिससे कई जगहों पर दरारें और जलभराव हो रहा है।
रात के बाज़ार की कहानी: बना और तीन साल में ही टूट गया – स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी विफलता का एक उदाहरण लहरतारा-चौकाघाट फ्लाईओवर के नीचे बना नाइट मार्केट है। 2022 में 10 करोड़ रुपये की लागत से इसे विकसित किया गया, लेकिन तीन साल बाद 2025 में ही इसे तोड़ दिया गया। जिस फर्म को 16 साल के लिए इसके संचालन की जिम्मेदारी दी गई थी, उसका अनुबंध भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोपों के चलते रद्द कर दिया गया। यह बताता है कि प्रोजेक्ट बनाने में जितनी तेज़ी दिखाई गई, उतनी ही लापरवाही उसके रखरखाव और प्रबंधन में बरती गई।
इन सब के बीच, सवाल उठता है कि जब 1278 करोड़ रुपये का बजट मिला, तो ये काम इतने कम समय में कैसे बदहाल हो गए? 2018 से अब तक 10.90 अरब रुपये के काम पूरे होने का दावा है, फिर भी शहर की सड़कों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों की यह हालत क्यों है?
स्मार्ट सिटी के उपकरण लगे पार्क में झूले की सीट गायब है, ओपन जिम के उपकरण टूटे पड़े हैं, और फाउंटेन खराब हैं। यह सब तब हो रहा है, जब देश के राष्ट्रपति के हाथों वाराणसी को सर्वश्रेष्ठ स्मार्ट सिटी का सम्मान मिल चुका है। यह सम्मान और शहर के मौजूदा हालात के बीच का अंतर हैरान करने वाला है।
जरूरत है कि सिर्फ नए प्रोजेक्ट बनाने पर नहीं, बल्कि पुराने प्रोजेक्ट्स के रखरखाव और उनकी गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक जनता के पैसे की बर्बादी यूं ही चलती रहेगी।




