वादी मुकदमा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मयंक मिश्रा और शिवांक त्रिपाठी ने न्यायालय में पक्ष रखा।
वाराणसी: एक दिल दहला देने वाले मामले में, वाराणसी की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मनीष कुमार की अदालत ने चितईपुर थाने को एक नाबालिग बच्चे और उसके दोस्त पर हुए अत्याचार के मामले में FIR दर्ज कर जांच करने का आदेश दिया है। इस मामले में थाना पुलिस पर भी लापरवाही और मनमानी का आरोप लगा है।
क्या है पूरा मामला? – यह घटना 16 जुलाई 2025 की है, जब दोपहर 2 बजे 17 साल का अंशुमान सिंह और उसका दोस्त स्नेहल सिंह, दोनों 11वीं कक्षा के छात्र, स्कूल से घर लौट रहे थे। भारी बारिश के कारण सड़क पर पानी भरा हुआ था। इसी दौरान, डॉ. संजय कुमार सरोज अपनी गाड़ी तेज रफ्तार से निकाल रहे थे, जिससे सड़क का गंदा पानी दोनों बच्चों और उनके बैग पर जा पड़ा।
बच्चों ने उन्हें धीरे गाड़ी चलाने के लिए रोका। यह देखकर कुछ और राहगीर भी जमा हो गए। इस पर डॉ. संजय ने बच्चों से माफी मांगी और उन्हें कपड़े सुखाने के बहाने अपने घर रुद्रा टावर, सुंदरपुर ले गए।
लेकिन, यह सिर्फ एक जाल था। रुद्रा टावर पहुंचते ही डॉ. संजय ने अपने मैनेजर और गार्डों की मदद से दोनों बच्चों को बंधक बना लिया। इसके बाद, डॉ. संजय, उनका मैनेजर, गार्ड और कुछ अज्ञात लोग बच्चों को लात-घूंसों और डंडों से बुरी तरह पीटने लगे। उन्होंने अंशुमान से उसकी स्कूल फीस के 1356 रुपये भी छीन लिए और उसे घर से और पैसे मंगाने के लिए धमकाने लगे।
किसी तरह अंशुमान ने मौका पाकर 112 नंबर पर फोन किया, जिसके बाद पुलिस के आने से उसकी और उसके दोस्त की जान बची।
पुलिस की मनमानी और लापरवाही – इस घटना के बाद, पीड़ित परिवार ने उसी दिन चितईपुर थाने में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। आरोप है कि पुलिस ने यह कहकर टाल दिया कि डॉ. संजय एक प्रभावशाली और पैसे वाले व्यक्ति हैं। जब पीड़ित ने मेडिकल कराने की बात कही, तो पुलिस ने उल्टे पीड़ित के नाबालिग बेटे को रात भर थाने में बैठाए रखा और अगले दिन उसका चालान कर दिया।
इसके बाद, पीड़ित परिवार ने पुलिस कमिश्नर को भी डाक और ऑनलाइन माध्यम से शिकायत भेजी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
न्यायालय का सख्त रुख – हार मानकर, पीड़ित ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। वादी मुकदमा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मयंक मिश्रा और शिवांक त्रिपाठी ने न्यायालय में दमदार तरीके से अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस की लापरवाही और मिलीभगत के कारण दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
वहीं, डॉ. संजय कुमार सरोज ने न्यायालय में पेश होकर आरोपों को गलत बताते हुए प्रार्थना पत्र को खारिज करने की गुहार लगाई।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और सभी सबूतों को देखने के बाद, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पाया कि यह मामला गंभीर और संज्ञेय प्रकृति का है। उन्होंने कहा कि बिना जांच के सच्चाई सामने नहीं आ सकती।
इसी आधार पर, न्यायालय ने चितईपुर थाने के थानाध्यक्ष को तुरंत इस मामले में FIR दर्ज करने और निष्पक्ष जांच कराने का आदेश दिया है।
यह आदेश उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जो अक्सर न्याय पाने के लिए सरकारी तंत्र की लापरवाही का शिकार होते हैं। यह दिखाता है कि न्यायपालिका आज भी आम आदमी की आखिरी उम्मीद है।




