भारत भर में अंधत्व निवारण और नेत्रदान के महत्व को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से हर साल ‘राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा’ का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष भी 41वाँ राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा: नेत्र प्रत्यारोपण में नई तकनीकों का सफल प्रयोग विषय के साथ इस अभियान को एक नई ऊर्जा और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के संयोजन के साथ शुरू किया गया है। वाराणसी में ‘वाराणसी आई बैंक सोसाइटी’ और साह हॉस्पिटल के तत्वावधान में आयोजित एक विशेष पत्रकार वार्ता के दौरान इस अभियान की विस्तृत रूपरेखा साझा की गई।

वाराणसी में 25 अगस्त से 8 सितंबर तक जनजागरण अभियान = पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए वाराणसी आई बैंक सोसाइटी के अध्यक्ष प्रद्युम्न कुमार साह ने बताया कि संपूर्ण भारत में नेत्रदान कार्यक्रम को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से वाराणसी में 25 अगस्त से 8 सितंबर तक विशेष आयोजनों की श्रृंखला चलाई जा रही है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 15 लाख लोग पुतली (कॉर्निया) की खराबी के कारण दृष्टिहीनता का सामना कर रहे हैं। वाराणसी आई बैंक सोसाइटी की प्रतीक्षा सूची में ही 1100 से अधिक दृष्टिहीन पंजीकृत हैं, जिन्हें एक दाता (Donor) का इंतजार है।
शहरी ही नहीं, अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी बढ़ रहा है रुझान = अध्यक्ष प्रद्युम्न कुमार साह ने बताया कि अब केवल शहरी इलाकों तक ही नेत्रदान सीमित नहीं रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों का रुझान नेत्रदान की ओर तेज़ी से बढ़ा है, जो कि समाज के लिए एक बेहद सकारात्मक संकेत है। प्रमुख कार्यक्रम और तिथियां : विभिन्न जन-जागरूकता रैलियां व स्कूल अभियान: पखवाड़े के दौरान निरंतर। नेत्रदाता परिवारों का सम्मान समारोह: 5 सितंबर को I.M.A. भवन (वाराणसी) में। समापन समारोह: 8 सितंबर को D.A.V. कॉलेज में।
नेत्र प्रत्यारोपण में नई तकनीकों का सफल प्रयोग: DALK और DSAEK = पत्रकार वार्ता में काली पुतली (Cornea) के विशेषज्ञों ने चिकित्सा क्षेत्र में आई क्रांतिकारी तकनीकों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उत्तर प्रदेश में पहली बार एक ही दान की गई काली पुतली से दो अलग-अलग दृष्टिहीन व्यक्तियों का सफल नेत्र प्रत्यारोपण संभव हो पाया है। यह DALK और DSAEK जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के कारण संभव हुआ है।
उत्तर प्रदेश में नेत्रदान की चुनौतियाँ और समाधान = काली पुतली विशेषज्ञ डॉ. ऋषभ साह ने बताया कि जनसंख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य होने के बावजूद नेत्रदान में पीछे है। इसका मुख्य कारण HCRP (Hospital Cornea Retrieval Programme) का प्रभावी क्रियान्वयन न होना और प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी है। वाराणसी के बड़े ICU अस्पतालों को इससे जोड़ने और डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने का प्रयास जारी है।
नेत्रदान महादान है। 41वाँ राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा नेत्र प्रत्यारोपण में नई तकनीकों का सफल प्रयोग न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, बल्कि समाज में जागरूकता फैलाने का बेहतरीन अवसर भी है।


