सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बिहार के राजनीतिक दलों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने उन्हें मतदाता सूची से छूटे हुए लोगों की मदद न करने के लिए फटकार लगाई। यह टिप्पणी तब आई जब चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है, लेकिन किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल ने कोई आपत्ति या शिकायत दर्ज नहीं कराई है।

चुनाव आयोग ने बताया कि जनता की ओर से शिकायतें आ रही हैं, लेकिन राजनीतिक दल इस मामले में पूरी तरह से निष्क्रिय हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “हम राजनीतिक दलों की निष्क्रियता से हैरान हैं।”

कोर्ट ने सवाल उठाया कि बूथ-स्तरीय एजेंट (BLA) नियुक्त करने के बाद भी ये राजनीतिक दल क्या कर रहे हैं? लोगों और स्थानीय नेताओं के बीच इतनी दूरी क्यों है? कोर्ट ने साफ कहा कि राजनीतिक दलों को मतदाताओं की मदद करनी चाहिए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 12 राजनीतिक दलों को पक्षकार बनाया और उन्हें निर्देश दिया कि वे अपने कार्यकर्ताओं को आदेश दें कि वे लोगों को शिकायत दर्ज कराने में मदद करें। इसके लिए लोग चुनाव आयोग द्वारा सूचीबद्ध 11 दस्तावेजों या आधार कार्ड का उपयोग कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की इस फटकार से यह साफ हो गया है कि राजनीतिक दल सिर्फ चुनाव के दौरान ही सक्रिय नहीं रह सकते, बल्कि उन्हें जनता से जुड़े मुद्दों पर भी काम करना होगा। अब देखना यह है कि क्या इस फटकार के बाद बिहार के राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं और मतदाता सूची में सुधार के लिए आगे आते हैं।

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