रामकृष्ण मरने के करीब थे। उनकी पत्नी बहुत रोने-पीटने, चिल्लाने लगी। तो रामकृष्ण ने कहा, तू क्यों घबराती है? क्योंकि मैं नहीं मर रहा हूं; ये तो वस्त्र जीर्ण-शीर्ण हो गए हैं। देखती है, गले में कैंसर हो गया है और यह शरीर सड़ गया है। अब इस शरीर में रहना एक गिरते हुए घर में रहना है, जो किसी भी क्षण गिर सकता है। इसलिए छोड़ता हूं इस जीर्ण-शीर्ण देह हो। मैं नहीं मर रहा हूं, केवल वस्त्र बदल रहा हूं।
यह घटना केवल एक संत की मृत्यु का किस्सा नहीं, बल्कि अमरता के गहनतम अनुभव और प्रेम की पराकाष्ठा का प्रमाण है। जब महान संत रामकृष्ण परमहंस अपने नश्वर शरीर को त्याग रहे थे, तब उनके मुख से निकले ये शब्द — “मैं नहीं मर रहा हूँ, केवल वस्त्र बदल रहा हूँ”— अध्यात्म के सबसे बड़े सत्य को सरलतम ढंग से व्यक्त करते हैं। यह लेख महान संत रामकृष्ण के इस अलौकिक अनुभव और उनकी धर्मपत्नी शारदा देवी के अद्वितीय समर्पण पर केंद्रित है, जो आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है।
रामकृष्ण का अनुभव: वस्त्र बदल रहा हूँ, मैं नहीं मरूंगा – रामकृष्ण परमहंस को जीवन के अंतिम क्षणों में गले का भयंकर कैंसर था, जिसने उनके शरीर को पूरी तरह जर्जर कर दिया था। जब उनकी पत्नी शारदा वियोग में विलाप करने लगीं, तब रामकृष्ण ने उन्हें एक ऐसा सत्य बताया जो उन्होंने किसी शास्त्र को पढ़कर नहीं, बल्कि सीधे आत्म-अनुभव से जाना था।
रामकृष्ण ने कहा कि यह शरीर एक जीर्ण-शीर्ण वस्त्र के समान है, जो अब रहने लायक नहीं रहा। उन्होंने अपने अनुभव की झलक आँखों में लिए कहा: “मैं नहीं मरूंगा, तू चिंता न कर, मेरी कोई मृत्यु नहीं, सिर्फ कपड़े बदल रहा हूं।” यह कोई सिद्धांत नहीं था, बल्कि साक्षात अनुभव था। जब भीतर आत्म-प्रकाश फूटता है, तो उसकी झलक स्वतः ही आँखों में आ जाती है। रामकृष्ण परमहंस के ये शब्द आत्मा की अमरता के सबसे बड़े प्रमाण हैं।
शारदा देवी का गहन प्रेम और भरोसा – शारदा ने रामकृष्ण परमहंस की आँखों में उस अनुभव की झलक को देखा। उनका वर्षों का गहन प्रेम और अटूट भरोसा ही वह कारण बना कि वह इस अदृश्य सत्य को स्वीकार कर सकीं। जब रामकृष्ण ने कह दिया कि “मैं नहीं मरूंगा,” तो शारदा के लिए बात समाप्त हो गई।
रामकृष्ण मर गए और शारदा विधवा न हुई – जब सारे प्रियजन, परिचित, रिश्तेदार इकट्ठा हुए और शारदा से विधवा के रीति-रिवाज निभाने को कहा — जैसे चूड़ियां फोड़ना और वस्त्र बदलना — तो शारदा ने स्पष्ट इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “वे कह कर गए हैं कि मैं नहीं मरूंगा, और वे नहीं मरे हैं। मैं अनुभव करती हूं कि जीर्ण-शीर्ण देह छूट गई है, वे हैं।“
शारदा देवी भारत की अकेली स्त्री जो पति के मरने पर विधवा न हुई – शारदा अकेली स्त्री हैं भारत में, जिन्होंने पति की देह त्यागने के बाद भी स्वयं को विधवा नहीं माना।
- वह बहुत वर्षों तक जीयीं, लेकिन उनकी चूड़ियाँ हाथ पर रहीं।
- उनकी आँखों में कभी आँसू दिखाई नहीं पड़े।
- वह ठीक वैसे ही रहीं, जैसे रामकृष्ण की मौजूदगी में थीं।
लोग उन्हें पागल समझने लगे, क्योंकि वह रोज रामकृष्ण के सोने के समय मसहरी डालतीं, उनके भोजन के वक्त थाली लगातीं, उन्हें बुलाने आतीं और बैठकर पंखा चलातीं।
स्वामी विवेकानंद ने एक बार उनसे पूछा, “मां, यह भी मान लें कि देह मिट गई, वे हैं, लेकिन यहां तो नहीं हैं?”
इस पर शारदा हंसने लगीं और जो उत्तर दिया, वह अध्यात्म का सार है:
“देह की वजह से यहां और वहां का सवाल था। जब देह ही मिट गई, तो अब सब जगह हैं। अब तो जहां भी देखूं, उनको देख पा सकती हूं, जहां भी उनको निमंत्रण दे सकूं, वहीं से वे निमंत्रित हैं। देह की वजह से अड़चन थी कि वे कहीं होते थे; अब सब जगह हैं।“
रामकृष्ण परमहंस और शारदा देवी का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि प्रेम की पराकाष्ठा में, आत्मा के सत्य का अनुभव होने पर, मृत्यु केवल एक भ्रम मात्र रह जाती है। शारदा का प्रेम उन्हें उस चेतना से जोड़े रखा, जो शरीर के बंधन से मुक्त होकर सर्वव्यापी हो चुकी थी। यह विश्वास ही शारदा को विधवा होने से बचाता है और उन्हें ‘श्री माँ’ के रूप में पूजनीय बनाता है।
निष्कर्ष: रामकृष्ण – मैं नहीं मर रहा हूँ, सिर्फ वस्त्र बदल रहा हूँ – रामकृष्ण परमहंस की यह अंतिम शिक्षा आज भी हमें जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों को समझने की दृष्टि देती है। सच्चा प्रेम और गहन आध्यात्मिक अनुभव हमें भयमुक्त करता है और यह स्थापित करता है कि हम शरीर नहीं, बल्कि अमर आत्मा हैं, जो केवल पुराने वस्त्र बदल रहा हूँ। शारदा देवी का जीवन इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि आत्मा की अमरता पर सच्चा भरोसा हमें वियोग और शोक से मुक्त कर देता है।







