वाराणसी : उत्तर प्रदेश के वाराणसी की ऐतिहासिक ‘दालमंडी’ में सड़क चौड़ीकरण के लिए चल रहे ध्वस्तीकरण अभियान को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी किरायेदार का कानूनी अधिकार तभी तक सुरक्षित रहता है जब तक वह समय पर किराया देता है और परिसर के कब्जे में बना रहता है।

वाराणसी के चर्चित दालमंडी प्रकरण में एक किरायेदार द्वारा दाखिल याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने किरायेदारी कानून और बेदखली प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की है।

क्या है पूरा मामला? (वाराणसी दालमंडी प्रकरण) प्रकरण के अनुसार, याचिकाकर्ता फरमान इलाही दालमंडी के कुंदीगढ़ टोला (मकान नंबर सीके 39/5) में एक किरायेदार थे। उन्होंने अपने मकान मालिक शहनवाज खान द्वारा 27 दिसंबर 2025 को उत्तर प्रदेश सरकार (राज्यपाल) के पक्ष में निष्पादित किए गए ‘बिक्री पत्र’ (Sale Deed) को चुनौती दी थी।याचिकाकर्ता का तर्क था कि वह एक ‘इच्छुक व्यक्ति’ (Interested Person) की श्रेणी में आता है। भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के तहत ध्वस्तीकरण से पहले उसे धारा 21 के तहत नोटिस दिया जाना चाहिए था। राज्य सरकार ने बिना उचित प्रक्रिया के संपत्ति को ध्वस्त कर दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किरायेदार के अधिकारों पर क्या कहा? अदालत ने याचिका पर सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट किरायेदार अधिकार वाराणसी दालमंडी से जुड़े कानूनी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए निम्नलिखित बिंदु रखे : कब्जा और किराया अनिवार्य: कोर्ट ने कहा कि किरायेदार का अधिकार तभी तक अस्तित्व में रहता है जब तक वह किराया चुकाता है। यदि किरायेदार परिसर खाली कर देता है या कब्जा छोड़ देता है, तो उसका कानूनी अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है। बेदखली नोटिस की आवश्यकता नहीं: यदि किरायेदार पहले ही परिसर को खाली कर चुका है या कब्जा छोड़ चुका है, तो उसे ध्वस्तीकरण या बेदखली के लिए अलग से नोटिस देना आवश्यक नहीं है। बिक्री पत्र को चुनौती देने का अधिकार: कोर्ट ने माना कि मकान मालिक (शहनवाज खान) को अपनी संपत्ति बेचने का पूर्ण अधिकार है और एक किरायेदार उस ‘बिक्री पत्र’ की वैधता को चुनौती नहीं दे सकता।

राज्य सरकार का पक्ष: सड़क चौड़ीकरण और जनहित राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता श्रुति मलविया ने प्रभावी ढंग से तर्क दिया कि दालमंडी क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण के लिए 30 जुलाई 2025 को सरकारी आदेश जारी किया गया था। यह भूमि स्वामियों की आपसी सहमति से खरीदी गई है। भवन स्वामी ने स्वेच्छा से कब्जा सरकार को सौंप दिया था, जिसके बाद ही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई। याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत तस्वीरें अविश्वसनीय हैं क्योंकि उनमें तिथि या समय का उल्लेख नहीं था।

कोर्ट का निष्कर्ष: क्यों खारिज हुई याचिका? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि उसने पिछले अंतरिम आदेशों का पालन किया था या नहीं। रिकॉर्ड के अनुसार, जब मकान मालिक ने सरकार के पक्ष में रजिस्ट्री कर दी और कब्जा सौंप दिया, तो किरायेदार का कोई स्वतंत्र अधिकार शेष नहीं रह गया था।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट किरायेदार अधिकार वाराणसी दालमंडी के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि विकास कार्यों के लिए आपसी सहमति से ली गई संपत्तियों में किरायेदारों के पास मकान मालिक के फैसले को पलटने का अधिकार नहीं होता, विशेषकर तब जब वे स्वयं शर्तों का उल्लंघन कर चुके हों।

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