आरोपियों की करोड़ों की काली कमाई पर कब चलेगा बुलडोजर? शिथिल पड़ती कार्रवाई पर उठे सवाल
वाराणसी। उत्तर प्रदेश में इन दिनों जहरीली कफ सीरप तस्करी का मामला सुर्खियों में है। विभिन्न जांच एजेंसियां इस नेटवर्क को खंगालने में जुटी हैं, लेकिन जनता के बीच एक बड़ा सवाल तैर रहा है—क्या कफ सीरप तस्करी मामले में हो रही कार्रवाई अब शिथिल पड़ चुकी है? पूर्व में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद से ही यह चर्चा का विषय बना हुआ है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल उन करोड़ों की संपत्तियों को लेकर है, जो इस काले कारोबार से खड़ी की गई हैं।
कफ सीरप तस्करी के खेल की गहराई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुख्य आरोपी आलोक सिंह और शुभम जायसवाल की संपत्तियों का मूल्यांकन (Valuation) करना भी चुनौती बन गया है। सूत्रों के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जिन वैल्यूअर को भेजा था, उन्होंने माफिया के खौफ के कारण रिपोर्ट बनाने से मना कर दिया। बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह के घर पहुंचे तीन वैल्यूअर बिना काम किए लौट गए। वाराणसी में भी शुभम के घर की कीमत आंकने गए वैल्यूअर को पीछे हटना पड़ा, जिसके बाद लखनऊ से दूसरी टीम भेजनी पड़ी।
20 करोड़ का आलीशान मकान, पर आय का स्रोत गायब – जांच के दौरान आलोक सिंह और अमित सिंह टाटा से एसटीएफ (STF) ने कड़ी पूछताछ की। चौंकाने वाली बात यह है कि आलोक सिंह मात्र तीन साल के भीतर 20 करोड़ रुपये की लागत से बना आलीशान मकान खड़ा कर लिया, लेकिन वह इस भारी-भरकम रकम का स्रोत नहीं बता सका। पूछताछ में आरोपियों ने सारा ठीकरा शुभम जायसवाल पर फोड़ दिया। उनका दावा है कि शुभम ने फर्जी फर्म बनाई और उन्हें धोखा दिया। एसटीएफ और एफएसडीए (FSDA) की सख्ती के बाद शुभम दुबई फरार हो गया है।
बुद्धिजीवियों का सवाल: कार्रवाई में देरी क्यों? – आज समाज का हर वर्ग और बुद्धिजीवी यह पूछ रहा है कि आखिर कफ सीरप तस्करी के आरोपियों—चाहे वह अमित सिंह टाटा हो, बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह, शुभम जायसवाल, अमित जायसवाल या प्रशांत उपाध्याय लड्डू—इनकी काली कमाई से अर्जित अवैध संपत्तियों के जब्तीकरण या ध्वस्तीकरण की कार्रवाई अभी तक क्यों नहीं हुई?
मुख्य अनसुलझे सवाल: फरार आरोपियों की गिरफ्तारी में इतनी देरी क्यों हो रही है? क्या आरोपी जांच एजेंसियों की पहुंच से भी ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं? अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चलने में क्या अड़चन आ रही है?
भविष्य के गर्भ में छिपे जवाब – कफ सीरप तस्करी का यह जाल न सिर्फ स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि एक बड़ा आर्थिक अपराध भी है। जहां एक ओर सरकार माफियाओं के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करती है, वहीं इस मामले में कार्रवाई की धीमी रफ्तार संदेह पैदा करती है। क्या आने वाले दिनों में इन आरोपियों के अवैध साम्राज्यों को जमींदोज किया जाएगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।




