वाराणसी: सदियों से चली आ रही परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं का शहर काशी, एक बार फिर एक अनोखी घटना का गवाह बना। रविवार को चंद्रग्रहण के कारण, विश्व प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट पर होने वाली मां गंगा की दैनिक आरती शाम की बजाय दोपहर में संपन्न हुई। यह पिछले 34 सालों में पांचवी बार है जब ग्रहण के चलते इस भव्य आरती का समय बदला गया है।

ग्रहण का प्रभाव और परंपरा का सम्मान – धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। इसी कारण, ग्रहण के सूतक काल से पहले ही सभी धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा कर लिया जाता है। गंगा सेवा निधि के अध्यक्ष सुशांत मिश्र ने बताया कि चंद्रग्रहण के सूतक काल को ध्यान में रखते हुए ही यह निर्णय लिया गया। सामान्यतः शाम को होने वाली गंगा आरती इस बार रविवार को दोपहर 12 बजे शुरू हुई और सूतक काल से पहले ही समाप्त हो गई।

यह बदलाव दिखाता है कि कैसे काशी अपनी प्राचीन परंपराओं का सम्मान करते हुए भी समय और खगोलीय घटनाओं के अनुरूप खुद को ढाल लेता है।

बीएचयू का श्री विश्वनाथ मंदिर भी रहा बंद – चंद्रग्रहण का प्रभाव केवल गंगा आरती तक सीमित नहीं था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर के कपाट भी इस दौरान 13 घंटे के लिए बंद रहे। दर्शनार्थियों और श्रद्धालुओं के लिए मंदिर में प्रवेश और पूजा-अर्चना ग्रहण के दौरान वर्जित रही। यह भी धार्मिक मान्यताओं का ही एक हिस्सा है, जिसके तहत ग्रहण काल में मंदिरों को बंद रखा जाता है।

जब-जब बदला आरती का समय – यह पहली बार नहीं है जब ग्रहण की वजह से गंगा आरती का समय बदला गया हो। गंगा सेवा निधि के अनुसार, इससे पहले भी चार बार ग्रहण के कारण यह ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। 28 अक्टूबर 2023, 16 जुलाई 2019, 27 जुलाई 2018 और 7 अगस्त 2017 को भी मां गंगा की आरती दिन में ही हुई थी।

हर बार, यह घटना काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक जीवंतता को दर्शाती है, जहाँ खगोलीय घटनाओं का सम्मान करते हुए भी आस्था और परंपरा को जीवित रखा जाता है। यह एक ऐसा संगम है जो काशी को वास्तव में अद्वितीय बनाता है।

इस बार भी, दिन के उजाले में हुई गंगा आरती का दृश्य उतना ही मनमोहक और अलौकिक था, जितना कि शाम के समय होता है।

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