काशी, जिसे भगवान शिव की नगरी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति, धर्म और आस्था का शाश्वत प्रतीक रही है। गंगा के तट पर बसी यह नगरी न केवल आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है, बल्कि भारत के नैतिक मूल्यों, सामाजिक परंपराओं और जीवन दृष्टिकोण की गहराई को भी प्रतिबिंबित करती है। परंतु आज, जब देश विकास और आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर हो रहा है, तब काशी जैसी पवित्र भूमि भी एक ऐसे संकट से जूझ रही है जो समाज की आत्मा को अंदर से खोखला कर रहा है—वह संकट है युवाओं के बीच बढ़ती नशे की प्रवृत्ति।

नशा कोई नया विषय नहीं है। सदियों से मानव समाज इसकी चपेट में आता रहा है, परंतु आज की स्थिति कहीं अधिक गंभीर है क्योंकि यह हमारी सबसे ऊर्जावान, सबसे संभावनाशील और सबसे संवेदनशील पीढ़ी—युवाओं—को अपनी गिरफ़्त में ले रही है। काशी की पवित्रता जहां आत्मशुद्धि, संयम और साधना की प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर इसके युवा नशे जैसी बुराई में फंसते जा रहे हैं। यह विरोधाभास न केवल चिंताजनक है, बल्कि हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं हमने सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण खो तो नहीं दिया?

काशी में हर गली, हर घाट और हर मंदिर एक संदेश देता है—आत्मज्ञान, शुद्ध आचरण और जीवन की पवित्रता का। यहां सुबह-शाम की आरतियों में उमड़ती श्रद्धा की भीड़, गंगा स्नान में आत्मशुद्धि की परंपरा और ज्ञान की नगरी में विद्यार्थियों की उपस्थिति, यह सब बताता है कि काशी केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवन दृष्टिकोण है। लेकिन जब इन्हीं गलियों में युवा गुटखा, शराब, गांजा, स्मैक और अन्य नशीले पदार्थों की गिरफ्त में आते हैं, तो उस पवित्रता पर एक अदृश्य परंतु गहरा आघात होता है।

युवाओं में नशे की प्रवृत्ति के कई कारण हैं। सबसे पहले, आज के समाज में बढ़ता तनाव, प्रतिस्पर्धा और असंतुलित जीवनशैली उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बना रही है। बेरोजगारी, पारिवारिक दबाव, अकेलापन और डिजिटल दुनिया की आभासी कल्पनाएं उन्हें वास्तविकता से दूर कर रही हैं। जब जीवन में उद्देश्य की स्पष्टता नहीं होती, तो नशा एक झूठा समाधान बनकर सामने आता है—एक ऐसा समाधान जो कुछ देर की राहत तो देता है, परंतु धीरे-धीरे शरीर, मन और आत्मा—तीनों को खा जाता है।

काशी में नशा केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, यह पूरे सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर रहा है। जब एक युवा नशे की ओर बढ़ता है, तो उसका परिवार, उसका मोहल्ला, उसकी कक्षा, यहां तक कि उसका भविष्य भी प्रभावित होता है। एक युवा का पतन समाज के सामूहिक पतन की ओर इशारा करता है। काशी की पवित्रता केवल मंदिरों और घाटों में नहीं, बल्कि उन युवा चेहरों में भी है, जो सुबह सूरज उगने से पहले ज्ञान की खोज में निकलते हैं, जो संगीत, कला, शास्त्र और सेवा के पथ पर चलते हैं। लेकिन जब यही चेहरे नशे से मलिन हो जाते हैं, तो काशी की आत्मा भी जैसे रो पड़ती है।

नशा मुक्ति के लिए सिर्फ सरकारी योजनाओं या पुलिस कार्यवाही पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। यह एक सामाजिक आंदोलन होना चाहिए। सबसे पहले, हमें यह समझना होगा कि नशे की लत एक बीमारी है, अपराध नहीं। इसका उपचार चाहिए, तिरस्कार नहीं। समाज को ऐसे युवाओं को अपनाना होगा, उन्हें पुनर्वास के अवसर देने होंगे और सबसे ज़रूरी—उन्हें सुनना और समझना होगा। जब एक युवा यह अनुभव करता है कि समाज उसकी पीड़ा को समझ रहा है, तभी वह नशे से मुक्ति की ओर पहला कदम बढ़ाता है।

काशी में पहले से ही कई समाजसेवी संस्थाएं, संत, शिक्षाविद् और युवा संगठन इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ जैसे प्रयासों को अगर काशी की सांस्कृतिक चेतना और धार्मिक ऊर्जा का साथ मिले, तो यह आंदोलन केवल एक सरकारी पहल न रहकर जन-जन का संकल्प बन जाएगा। गंगा की तरह निर्मल जीवन, शिव की तरह संयमित आचरण और तुलसीदास की तरह आत्मशक्ति—यही काशी के युवाओं की पहचान बननी चाहिए।

शैक्षणिक संस्थानों को चाहिए कि वे शिक्षा को केवल अंक या परीक्षा तक सीमित न रखें, बल्कि जीवन मूल्यों और मानसिक स्वास्थ्य पर भी जोर दें। खेलकूद, योग, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और सामाजिक संवाद युवाओं को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब एक युवा खेल के मैदान में पसीना बहाता है, तो उसे नशे की ओर जाने का अवसर ही नहीं मिलता। जब उसे मंच पर अपनी रचनात्मकता दिखाने का अवसर मिलता है, तो वह आत्मगौरव से भर उठता है। काशी जैसे सांस्कृतिक नगर में इन गतिविधियों की कोई कमी नहीं है, आवश्यकता है तो बस उन्हें युवाओं तक ले जाने की।

अभिभावकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्सर माता-पिता अपने बच्चों की भावनात्मक दुनिया से अनजान रहते हैं। संवाद की कमी, अधिक अपेक्षाएँ, तुलना और अनदेखा किया जाना बच्चों को धीरे-धीरे एक ऐसी दुनिया में धकेल देता है जहां वे खुद को अकेला महसूस करते हैं। इस खालीपन को भरने के लिए वे नशे की ओर मुड़ते हैं। यदि परिवार में संवाद, समझदारी और प्रेम का वातावरण हो, तो कोई भी युवा इतनी जल्दी उस अंधेरे रास्ते पर नहीं जाएगा।

काशी की संत परंपरा, साधु-संतों के उपदेश और मंदिरों की शिक्षाएं यदि नशा मुक्ति के अभियान से जुड़ जाएं, तो यह आंदोलन और भी व्यापक और प्रभावशाली बन सकता है। कल्पना कीजिए कि मणिकर्णिका घाट पर केवल अंतिम संस्कार न हो, बल्कि जीवन पुनरुत्थान के गीत भी गूंजें; कि दशाश्वमेध घाट की आरती में केवल दीप न जलें, बल्कि युवाओं के भीतर आत्मदीप भी प्रज्ज्वलित हों।

नशा मुक्ति केवल एक स्वास्थ्य अभियान नहीं, यह जीवन के पुनर्निर्माण का अभियान है। जब एक युवा नशे से मुक्त होकर अपने जीवन को फिर से गढ़ता है, तो वह केवल अपना ही नहीं, बल्कि समाज का भी भविष्य संवारता है। काशी जैसी पवित्र भूमि को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि वह इस आंदोलन की अगुआई कर सकती है। यहां के विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, गुरुकुल, NGO और स्वयंसेवी कार्यकर्ता मिलकर एक ऐसी श्रृंखला बना सकते हैं जो हर युवा को उसकी शक्ति का स्मरण कराए।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि काशी की पवित्रता केवल पूजा, आस्था और परंपरा में नहीं, बल्कि उसमें है कि यहां का प्रत्येक युवा स्वयं को इस धरती का उत्तराधिकारी माने और अपनी जिम्मेदारियों को समझे। जब युवा यह स्वीकार कर लेता है कि उसका जीवन केवल उसका नहीं, बल्कि समाज की धरोहर है, तभी वह अपने भीतर की कमज़ोरियों से लड़ने के लिए प्रेरित होता है।

नशा मुक्ति का संकल्प केवल शब्दों का खेल नहीं, यह आत्मा का युद्ध है। काशी को चाहिए कि वह अपने युवाओं में वह ऊर्जा फूंके जिससे वे इस युद्ध को जीत सकें। यह नगर जो मृत्यु को भी मोक्ष का द्वार मानता है, वहां जीवन की सबसे बड़ी विजय—नशे से मुक्ति—एक उत्सव बन जाए, तो यह केवल काशी ही नहीं, पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन सकता है।

काशी की गूंज हर युवा के कानों में पड़े—”उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक तुम अपने जीवन को फिर से पवित्र न कर लो।” यही संकल्प, यही ऊर्जा और यही चेतना हमें चाहिए एक नशा मुक्त भारत के लिए, और उसका आरंभ क्यों न काशी से हो—जहां जीवन और मृत्यु, दोनों के रहस्य गंगा की लहरों में गूंजते हैं।

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