कुछ लोग कम्बल के अंदर घी पीने की कहावत को भी कर रहे है चरितार्थ, जिनकी जांच कर कार्रवाई किया जाना है अतिआवश्यक
वाराणसी। बताते चले की उत्तर प्रदेश में इस समय कफ सीरप का मामला काफी जोरो शोरो से चल रहा है। जिसे लेकर विपक्ष भी लगातार शासन पर हमलावर है। वही उक्त मामले में अब तक कई लोगो की गिरफ्तारियां भी हो चुकी है, साथ ही पूरे मामले की जांच भी एसआईटी व ईडी के द्वारा की जा रही है। वहीं अब तक की जांच में कई सफेदपोश लोगो के साथ ही दवा का काला कारोबार करने वाले भी जांच एजेंसियों के रडार पर है।
वही इस मामले से संबंधित मुख्य सरगना बताये जाने वाले शुभम जायसवाल सहित कुछ लोग अब भी फरार है जिनकी तलाश मुस्तैदी के साथ की जा रही है। अब वहीं बात की जाये तो अब भी ऐसे कई सवाल है जो संदेह के घेरे में है। जिसमे काफी दिनों से चल रहे इस काले कारोबार की जानकारी क्या वाराणसी पुलिस प्रशासन को नही थी? क्या पुलिस विभाग का खुफिया तंत्र पूरी तरीके से इस मामले में निष्क्रिय हो चुका था या फिर अपने निजी लाभ के चलते क्षेत्रीय प्रशासन या जिला प्रशासन अपनी आंखें मूंदे हुये था?
साथ ही यदि सूत्रों की बातों पर यकीन करें तो जिला प्रशासन के कई ऐसे अधिकारी और कर्मचारी है जिनकी संलिप्तता भी इस मामले में कहीं न कहीं थी, तो क्या इसकी भी जांच कर दोषियों को सजा दिलाया जाना न्याय हित मे होगा। वही दूसरी ओर सूत्रों की बातों पर यकीन करे तो थाना चौक क्षेत्र के निवासी अपने आपको पत्रकार बताने वाले व्यक्ति जो कचौड़ी के नाम से प्रसिद्ध है और शुभम जायसवाल से इनके सम्बन्ध भी काफी मधुर है जिसका साक्ष्य भी उपलब्ध है। साथ ही इसी शुभम जायसवाल के स्वजाति के जो थाना कोतवाली के निवासी और अपने आपको बड़का पत्रकार कहने वाले लोगो के द्वारा विगत कुछ दिनों पूर्व शहर के कुछ पत्रकारों में 27 लाख रुपये को बांटने का कार्य भी किया गया। जिसका मकसद इस कफ सीरप व शुभम जायसवाल के खिलाफ समाचार को प्रकाशित व प्रसारित न करने देना था।
अब ऐसी परिस्थिति में यह एक बड़े गिरोह के रूप में प्रकाश में आ रहा है, जिसमे पत्रकार, औषधि विभाग और पुलिस प्रशासन की भूमिका भी संदेह के घेरे में आती है। अब ऐसी परिस्थिति में इन सब की जांच भी किया जाना न्यायोचित होगा और इस सिंडिकेट को पूरी तरह से खत्म करना समाज व न्यायहित में अतिआवश्यक है।







