बचाव पक्ष के वकीलों में वरिष्ठ अधिवक्ता अनुज यादव, अभिषेक श्रीवास्तव पंकज, नरेश यादव और संदीप यादव शामिल थे

वाराणसी। शहर के चर्चित मामलों में अक्सर सुर्खियां बटोरने वाली सिगरा पुलिस को सोमवार को अदालत में उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब एक आर्म्स एक्ट मामले में उनकी मांग को सिरे से खारिज कर दिया गया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) मनीष कुमार की अदालत ने पुलिस द्वारा पेश किए गए आरोपी की न्यायिक रिमांड की अर्जी को नामंजूर कर दिया, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

यह मामला लालपुर पाण्डेयपुर निवासी इकबाल खान, जिसे चंडूल के नाम से भी जाना जाता है, की गिरफ्तारी से जुड़ा है। सिगरा पुलिस ने इकबाल को आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार कर सोमवार को भारी उम्मीदों के साथ अदालत में पेश किया था। पुलिस का मानना था कि आरोपी का पुराना आपराधिक इतिहास देखते हुए उन्हें आसानी से उसकी न्यायिक रिमांड मिल जाएगी, ताकि वे मामले में और पूछताछ कर सकें।

लेकिन कोर्ट में तस्वीर पूरी तरह से पलट गई। बचाव पक्ष के वकीलों की एक मजबूत टीम, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता अनुज यादव, अभिषेक श्रीवास्तव पंकज, नरेश यादव और संदीप यादव शामिल थे, ने पुलिस की दलीलों को तार-तार कर दिया।

बचाव पक्ष की दमदार दलीलें अदालत में बचाव पक्ष ने पूरी दृढ़ता के साथ यह तर्क दिया कि इकबाल खान को इस मामले में झूठा फंसाया जा रहा है। उन्होंने कहा, “पुलिस ने आरोपी को केवल एक सह-अभियुक्त के बयान के आधार पर गिरफ्तार किया है। इकबाल के पास से न तो कोई हथियार मिला और न ही कोई कारतूस। यह गिरफ्तारी पूरी तरह से मनगढ़ंत और फर्जी है।”

वकीलों ने इस बात पर जोर दिया कि सिर्फ किसी का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड होना उसे किसी भी नए मामले में दोषी नहीं बना देता। पुलिस केवल उसके अतीत को आधार बनाकर उसे परेशान कर रही है और अदालत से रिमांड की मांग कर रही है, जो कि कानूनन सही नहीं है।

अदालत का ऐतिहासिक फैसला दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और केस की फाइल का गहन अध्ययन करने के बाद, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मनीष कुमार ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने बचाव पक्ष के तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि आरोपी के पास से कोई भी अवैध वस्तु बरामद नहीं हुई है। मात्र इस आधार पर कि उसका पुराना आपराधिक इतिहास है, उसे आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

इस ठोस टिप्पणी के साथ, अदालत ने सिगरा पुलिस की न्यायिक रिमांड की अर्जी को “रिफ्यूज” कर दिया, यानी खारिज कर दिया। यह फैसला न केवल आरोपी इकबाल खान के लिए एक बड़ी राहत है, बल्कि यह पुलिस के लिए भी एक संदेश है कि किसी भी व्यक्ति को बिना ठोस सबूत के सलाखों के पीछे नहीं भेजा जा सकता। अदालत के इस फैसले की शहर के कानूनी हलकों में खूब चर्चा हो रही है।

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