काशी की धड़कन आज जख्मी, सांसद को रोका, सियासत गरमाई
वाराणसी। जब से जनपद के ऐतिहासिक दालमंडी सड़क चौड़ीकरण का मामला सुर्खियों में आया है और उस पर कार्रवाई भी शुरू हुई है, तब से इस बाजार के सैकड़ों दुकानदारों के सामने अपने और अपने परिवार का भरण-पोषण करने की समस्या एक विकराल रूप लेती जा रही है। हर दुकानदार की आंखें सिर्फ यही देख रही हैं कि कोई तो आए जो उनके इस दुख-दर्द को सुने, समझे और इसके निराकरण की ओर कदम बढ़ाए।
मगर, ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिल रहा है। जिला प्रशासन भी इस वक्त शायद वो कार्य कर रहा है, जिसे वो करना नहीं चाहता, पर शासनादेश के आगे मजबूर नजर आ रहा है।
दालमंडी अब अपने पुराने स्वरूप को खोते हुए देखी जा रही है। जहां कभी इन दुकानों पर लोगों की भारी भीड़ खरीददारी के लिए उमड़ती थी, अब वहां सन्नाटा पसरता जा रहा है। लोग अपने जीवनभर की कमाई को बक्सों में समेट रहे हैं।
काशी की धड़कन आज जख्मी – आपको बताते चलें कि दालमंडी सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि काशी की धड़कन है। आज वही गली ‘विकास’ के नाम पर जख्मी है। जो सड़क कभी रंगों और आवाजों से जीवंत रहती थी, अब वहां सिर्फ धूल, हथौड़ों और छेनियों की गूंज है।
सोमवार को दोपहर के बाद नगर निगम की टीमें फिर पहुंचीं। इस बार कुछ और दीवारें गिराई गईं और कुछ और पुरानी यादें मलबे में दब गईं।
सांसद को रोका, सियासत गरमाई – इस बीच, चंदौली के सपा सांसद वीरेंद्र सिंह व्यापारियों से मिलने पहुंचे, लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक लिया। उनके घर के बाहर भारी फोर्स तैनात कर दी गई। इस पर सांसद ने कहा, “हम अपने व्यापारियों से मिलकर रहेंगे, चाहे प्रशासन कुछ भी कर ले।”
दालमंडी के चौड़ीकरण में 187 मकान और छह मस्जिदें प्रभावित होंगी। कई मस्जिदें सौ साल से भी पुरानी हैं। प्रशासन का कहना है कि धार्मिक स्थलों के जिम्मेदारों से बातचीत जारी है, जिसका जल्द समाधान निकाला जाएगा।
गुस्से में व्यापारी और नेता – सपा सांसद वीरेंद्र सिंह जब दालमंडी जाने की कोशिश कर रहे थे, तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया। नाराज कार्यकर्ता उनके घर के बाहर धरने पर बैठ गए। पूर्व मंत्री मनोज राय धूपचण्डी ने कहा, “सरकार गरीबों से निवाला छीन रही है। रोजगार देना तो दूर की बात, अब कारोबार भी छीना जा रहा है।”
वहीं, एडीएम सिटी आलोक वर्मा मौके पर पहुंचे और सांसद को समझाने की कोशिश की, लेकिन उनका जवाब वही था, “हम दालमंडी जरूर जाएंगे, क्योंकि वहां सिर्फ दुकानें नहीं, लोगों की जिंदगियाँ टूट रही हैं।”
दालमंडी के इन दुकानदारों और निवासियों की निगाहें अब सिर्फ न्याय और पुनर्वास की ओर टिकी हैं। उनकी आँखों में सवाल है: क्या विकास की कीमत सिर्फ गरीब चुकाएगा?







