वाराणसी: काशी से लेकर पूरे उत्तर प्रदेश में इन दिनों दो बेहद गंभीर और संवेदनशील मुद्दे समाज की अंतरात्मा को झकझोर रहे हैं—पहला, त्योहारों के बाद जल स्रोतों में मूर्ति विसर्जन की उपेक्षित और दर्दनाक स्थिति, और दूसरा, अनियंत्रित DJ का शोर जो अब आम जनता के जीवन के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। इन दोनों ज्वलंत विषयों पर बनारस यूथ बार एसोसिएशन के संरक्षक एवं अधिवक्ता अजय पांडेय ‘बबलू’ ने प्रशासन, आयोजकों और समाज की कार्यप्रणाली पर तीखा सवाल उठाया है।

मूर्ति विसर्जन के बाद अवशेषों का बाहर आना: आस्था का सम्मान या अपमान? = सनातन संस्कृति में जिन देवी-देवताओं की हम प्राण-प्रतिष्ठा कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं, उत्सव संपन्न होने के बाद उनकी विसर्जन प्रक्रिया को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आ रही है। अजय पांडेय ‘बबलू’ ने इस पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा है कि :
“विसर्जन के बाद तालाबों या पोखरों में मूर्तियों के अवशेष बाहर आ जाते हैं या पानी कम होने की वजह से मूर्तियां पूरी तरह विसर्जित नहीं हो पातीं। जिन भगवान को हम पूजते हैं, उनकी ऐसी स्थिति धार्मिक भावनाओं को आहत करती है।”
जब तालाबों में जलस्तर कम होने या कीचड़ के कारण पवित्र मूर्तियां पूरी तरह नहीं गलतीं और उनके अवशेष व अंग पानी के ऊपर तैरते दिखाई देते हैं, तो यह हर आस्तिक को झकझोर देता है। इस पर कड़ा रोष व्यक्त करते हुए उन्होंने आगे कहा कि :
“पवित्र मूर्तियों को तालाब के गंदे पानी या गड्ढों में ‘फेंकने’ जैसी स्थिति आस्था का सम्मान नहीं, बल्कि उसका अपमान लगती है।”
प्रशासन और धार्मिक समितियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि मूर्ति विसर्जन केवल एक खानापूर्ति न बने, बल्कि इसके लिए पर्याप्त जल वाले कुंडों या नदियों में शास्त्र सम्मत एवं पर्यावरण-अनुकूल व्यवस्था हो।
मूर्ति विसर्जन के साथ-साथ दूसरा सबसे बड़ा संकट बनता जा रहा है बेलगाम DJ का शोर। आज के समय में उत्सवों और आयोजनों में बजने वाला DJ का शोर मनोरंजन की सीमा पार कर प्रत्यक्ष रूप से जानलेवा रूप ले चुका है। अजय पांडेय ‘बबलू’ ने कड़े शब्दों में पूछा है कि इस तबाही और कानून की धज्जियां उड़ने के पीछे आखिर जिम्मेदार कौन? DJ का संचालक, क्षेत्र थाना प्रभारी या क्लब का अध्यक्ष? अदालती आदेशों की अवहेलना: DJ का शोर जानलेवा साबित हो रहा है, और हैरानी की बात यह है कि माननीय अदालत के स्पष्ट आदेशों के बावजूद स्थानीय प्रशासन इस पर गंभीर संज्ञान नहीं ले रहा है। कानून और धाराएं: आपको बता दें कि Noise Pollution Rules, 2000 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 15 के तहत ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए बेहद कड़े कानून और अदालती निर्देश लागू हैं। इन नियमों के उल्लंघन पर 5 साल की जेल और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना तक का प्रावधान है, बावजूद इसके धड़ल्ले से नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
मासूम की मौत और आम जनजीवन पर भारी असर = अनियंत्रित DJ का शोर अब केवल कानों के परदे ही नहीं फाड़ रहा, बल्कि जिंदगी भी लील रहा है : मासूम की दर्दनाक मौत: तेज आवाज और DJ के शोर के बीच दबकर एक 9 साल की बच्ची की मृत्यु हो गई, जिसकी चीखें उस कर्णभेदी संगीत के शोर में पूरी तरह दब गईं और वह जोर-जोर से चिल्लाती रह गई, लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी। स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव: इस अत्यधिक तीव्र ध्वनि के कारण बुजुर्ग, बच्चे, महिलाएं, पुरुष और पहले से अस्वस्थ लोग मानसिक रूप से विक्षिप्तता (डिप्रेशन व एंग्जाइटी) की ओर बढ़ रहे हैं। मकानों में आ रही दरारें: DJ की ध्वनि इतनी तीव्र होती है कि उसके कंपन (Vibration) से आस-पास के कई मकानों की दीवारों में दरारें आने लगी हैं। अगल-बगल रहने वाले निवासियों को ऐसा महसूस होता है मानों भूकंप के झटके आ रहे हों, जबकि हृदय रोगी और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों को इससे अत्यधिक शारीरिक व मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है।
निष्कर्ष और कड़ा संदेश = यह समय केवल तमाशा देखने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने का है। चाहे वह मूर्ति विसर्जन की पवित्रता को बनाए रखने का मामला हो, या फिर DJ का शोर रोककर मासूमों की जान बचाने का—प्रशासन और समाज दोनों को जागना होगा। अदालती नियमों का कड़ाई से पालन हो, थानों की जवाबदेही तय की जाए और आस्था के नाम पर पर्यावरण तथा मानवीय जीवन से खिलवाड़ बंद हो।



