अदालत में बचाव पक्ष कि ओर से अधिवक्तागण रत्नेश्वर पाण्डेय, मयंक मिश्रा व विनय कुमार त्रिपाठी ने अपना जमानत प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया व दलीले दी।

वाराणसी। उत्तर प्रदेश की धार्मिक और न्यायिक नगरी वाराणसी से एक बड़ी कानूनी खबर सामने आ रही है। वाराणसी की एक स्थानीय अदालत ने शिवपुर थाने से जुड़े एक चोरी और माल खपाने के मामले में आरोपी की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए उसे राहत दे दी है। न्यायालय सिविल जज (जूनियर डिवीजन) / न्यायिक मजिस्ट्रेट एफ.टी.सी. (14वां वित्त आयोग), वाराणसी ने सरकार बनाम अमन सेठ मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अभियुक्त की जमानत मंजूर कर ली है।

क्या है पूरा मामला (मु.अ.सं. 250/2026)? यह पूरा मामला वाराणसी के शिवपुर थाने के अंतर्गत आता है। पत्रावली के अनुसार, बीती 5 जून 2026 को वादी मुकदमा कुमार विनोद ने अपने आवास का ताला तोड़कर सोने-चांदी के जेवरात और अन्य कीमती सामान चोरी होने के संबंध में एक मुकदमा दर्ज कराया था। इस मामले में पुलिस ने तफ्तीश के बाद अमन सेठ का नाम केस में जोड़ा था।

इस मामले में सरकार बनाम अमन सेठ केस के तहत पुलिस ने अभियुक्त पर नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) की निम्नलिखित धाराओं के तहत कार्रवाई की थी : धारा 317 (2): चोरी की संपत्ति को छुपाना या रखना। धारा 3 (5): सामान्य आशय (Common Intention)। धारा 112 (2): चोरी से संबंधित।

बचाव पक्ष और अभियोजन की दलीलें अदालत में सुनवाई के दौरान सरकार बनाम अमन सेठ मामले में अभियुक्त अमन सेठ की ओर से उनके अधिवक्तागण रत्नेश्वर पाण्डेय, मयंक मिश्रा व विनय कुमार त्रिपाठी ने जमानत प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि : अभियुक्त पूरी तरह से निर्दोष है और उसने ऐसा कोई अपराध नहीं किया है। प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में अमन सेठ का नाम सीधे तौर पर शामिल नहीं था। पुलिस द्वारा दिखाई गई कथित बरामदगी का कोई भी स्वतंत्र या स्थानीय जनसाक्षी (पब्लिक विटनेस) नहीं है। अमन सेठ का पूर्व में कोई भी आपराधिक इतिहास (Criminal History) नहीं रहा है और वह 12 जून 2026 से जिला कारागार में बंद है।

    दूसरी तरफ, सहायक अभियोजन अधिकारी (APO) ने सरकार बनाम अमन सेठ मामले में जमानत का कड़ा विरोध किया। अभियोजन पक्ष का कहना था कि आरोपी पर लगे आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और यह एक गैर-जमानती (Non-Bailable) अपराध है, इसलिए इसे जमानत का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

    कोर्ट ने क्यों दी जमानत? – न्यायिक मजिस्ट्रेट ने दोनों पक्षों की बहस सुनने और पत्रावली का गहन अवलोकन करने के बाद पाया कि सह-अभियुक्त के बयान के आधार पर अमन सेठ का नाम इस केस में आया था, जिसमें कथित तौर पर चोरी की पीली धातु (सोने) को गलाने का काम किया जाना बताया गया था। अदालत ने अपने आदेश में मुख्य रूप से इन बिंदुओं को आधार बनाया : थाने से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार आरोपी का कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं है। यह अपराध मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा विचारणीय है और इसमें 7 वर्ष से कम की सजा का प्रावधान है। मामले के गुण-दोष पर बिना कोई टिप्पणी किए, अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत का पर्याप्त आधार बनता है।

    न्यायालय का अंतिम आदेश – दिनांक 17 जून 2026 को सिविल जज (जू.डि.) / न्यायिक मजिस्ट्रेट एफ.टी.सी, 14वां वित्त आयोग, वाराणसी ने सरकार बनाम अमन सेठ मामले में अपना आदेश सुनाते हुए कहा :

    “अभियुक्त अमन सेठ को 35,000/- रुपये का व्यक्तिगत बंधपत्र (Personal Bond) एवं समान धनराशि की दो प्रतिभू (जमानतदार) प्रस्तुत करने पर जमानत पर रिहा किया जाए।”

    इस फैसले के बाद अब अमन सेठ के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है। वाराणसी कोर्ट का यह फैसला यह रेखांकित करता है कि बिना पुख्ता गवाहों और बिना आपराधिक इतिहास के किसी भी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता, विशेषकर तब जब सजा 7 साल से कम की हो।

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