सुनवाई के दौरान अदालत में आरोपी के अधिवक्ता संजीव वर्मा ने मजबूती से पक्ष रखा।
वाराणसी: उत्तर प्रदेश की धार्मिक एवं सांस्कृतिक नगरी वाराणसी की एक अदालत ने वर्ष 2007 में थाना सिगरा क्षेत्र में हुए बहुचर्चित जानलेवा हमले और आपराधिक षड्यंत्र के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने मामले के मुख्य आरोपी शानू उर्फ नाजिम हुसैन को बड़ी राहत देते हुए संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) प्रदान किया और सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया। यह फैसला अपर सत्र न्यायाधीश (कक्ष संख्या-08), वाराणसी के न्यायाधीश अमित कुमार तिवारी की अदालत द्वारा सुनाया गया।
क्या था 2007 का वाराणसी मोटर्स मामला? = घटना 19 अप्रैल 2007 की दोपहर लगभग 12:45 बजे की है। मामला सिगरा स्थित ‘वाराणसी मोटर्स’ के कार्यालय से जुड़ा है। वादी मुकदमा अहसन रउफ खां अपने पिता अब्दुल महमूद खां उर्फ नन्हू खां और अपने चालक अकील के साथ कार्यालय में बैठे हुए थे।

इसी दौरान तीन अज्ञात बदमाश हाथ में रिवाल्वर और पिस्टल लेकर दफ्तर के अंदर घुसे और जान से मारने की नीयत से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। हमले के दौरान चली गोली वादी के कान के बेहद करीब से निकल गई, जिससे वे बाल-बाल बच गए। मौके से गिरफ्तारी: गोली चलने की आवाज सुनकर शोरूम के कर्मचारी तुरंत अंदर पहुंचे और तत्परता दिखाते हुए एक हमलावर को मौके पर ही धर दबोचा। पकड़े गए बदमाश की पहचान अरशद के रूप में हुई। फरार अभियुक्त: मौके से भागने वाले दो अन्य आरोपियों की पहचान रवि पटेल उर्फ भोलू और संतोष शुक्ला के रूप में हुई थी। षड्यंत्र का आरोप: पुलिस विवेचना के दौरान यह दावा किया गया था कि इस जानलेवा हमले के पीछे शानू उर्फ नाजिम हुसैन और खुर्रम रउफ खां उर्फ गुड्डू की सोची-समझी आपराधिक साजिश (भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी) थी।
अदालत ने क्यों दिया शानू उर्फ नाजिम हुसैन को बरी करने का आदेश? = सुनवाई के दौरान अदालत में आरोपी के अधिवक्ता संजीव वर्मा ने मजबूती से पक्ष रखा। वहीं अदालत ने पत्रावली पर उपलब्ध सभी साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और साक्ष्य परीक्षणों का गहनता से अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष शानू उर्फ नाजिम हुसैन के खिलाफ साजिश में शामिल होने का कोई भी प्रत्यक्ष या विश्वसनीय सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां = षड्यंत्र का अभाव: कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि शानू उर्फ नाजिम हुसैन ने घटना से पूर्व अन्य सह-अभियुक्तों के साथ मिलकर कोई साजिश रची थी। आरोप साबित करने में असफलता: अभियोजन पक्ष अभियुक्त शानू उर्फ नाजिम हुसैन के विरुद्ध धारा 307/34, 452, 323/34, 506, 120बी भा०दं०सं० एवं 7 क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट के आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। संदेह का लाभ: कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, जब तक आरोप संदेह से परे सिद्ध न हों, अभियुक्त को संदेह का लाभ मिलना तय है। सह-अभियुक्तों की स्थिति: मामले से जुड़े अन्य सह-आरोपियों को पूर्व में ही अदालत द्वारा दोषमुक्त किया जा चुका था।
न्यायालय का अंतिम आदेश = अपर सत्र न्यायाधीश (कक्ष संख्या-08), वाराणसी ने सत्र वाद संख्या-295ए/2007 (मु0अ0सं0-190/2007, थाना सिगरा) में अंतिम फैसला सुनाते हुए शानू उर्फ नाजिम हुसैन को सभी आरोपों व संबंधित धाराओं से बरी कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने धारा 437ए दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अनुपालन में शानू उर्फ नाजिम हुसैन को आदेश दिया है कि वे एक सप्ताह के भीतर दो जमानतदारों के जमानतनामे अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना सुनिश्चित करें।



