बॉलीवुड के सौ सालों से अधिक के इतिहास में कई बड़े निर्देशक आए और गए, लेकिन के. आसिफ (K. Asif) एक ऐसा नाम है जो अपनी सिर्फ एक फिल्म के लिए अमर हो गया। उत्तर प्रदेश के इटावा की मिट्टी से निकले करीमुद्दीन आसिफ (के. आसिफ) के पास फिल्म मेकिंग की कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं थी, लेकिन उनका आत्मविश्वास ऐसा था कि बड़े-बड़े दिग्गज उनके सामने घबरा जाते थे।

आज bmbreakingnews.com के इस विशेष लेख में हम जानेंगे Mughal-e-Azam बनाने वाले उस शख्स की कहानी, जिसने भारतीय सिनेमा को एक ‘मील का पत्थर’ दिया।

के. आसिफ ने अपने पूरे करियर में केवल दो फ़िल्में बनाईं— ‘फूल’ (1945) और Mughal-e-Azam (1960)। जहाँ पहली फिल्म औसत रही, वहीं दूसरी फिल्म ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम सुनहरे अक्षरों से लिखवा लिया। जिस दौर में फिल्में मात्र 5-10 लाख रुपयों में बन जाया करती थीं, उस समय के. आसिफ ने Mughal-e-Azam पर 1.5 करोड़ रुपये खर्च किए। इस फिल्म को बनने में 14 साल का लंबा वक्त लगा, जिसका सफर अंग्रेजों के राज में शुरू हुआ और आजाद भारत में जाकर पूरा हुआ।

1. बंटवारे की वजह से रुकी शूटिंग – के. आसिफ को इस फिल्म का ख्याल आर्देशिर ईरानी की ‘अनारकली’ देखकर आया था। 1946 में फिल्म की शूटिंग शुरू हुई, लेकिन देश के विभाजन (Partition) के कारण प्रोड्यूसर शिराज़ अली हाकिम को पाकिस्तान जाना पड़ा। इसके बाद 1952 में नए प्रोड्यूसर और नई स्टार कास्ट के साथ Mughal-e-Azam का काम दोबारा शुरू हुआ।

2. जब नौशाद ने खिड़की से फेंक दिया पैसों का ब्रीफकेस – संगीत के शौकीन के. आसिफ एक बार नोटों से भरा ब्रीफकेस लेकर संगीतकार नौशाद के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, “ये लो पैसे और मुझे यादगार संगीत चाहिए।” नौशाद साहब को यह अंदाज पसंद नहीं आया और उन्होंने पैसे खिड़की से बाहर फेंक दिए। बाद में आसिफ ने माफी मांगी और तब जाकर Mughal-e-Azam को उसका अमर संगीत मिला।

3. बड़े गुलाम अली खान की भारी फीस – फिल्म में एक गाने के लिए शास्त्रीय गायक बड़े गुलाम अली खान की जरूरत थी। उन्होंने मना करने के लिए उस दौर में 25,000 रुपये की मांग की (जब रफ़ी और लता जी को 300-400 रुपये मिलते थे)। लेकिन जिद्दी आसिफ ने तुरंत 10,000 रुपये एडवांस थमा दिए और उन्हें गाने के लिए राजी कर लिया।

4. पृथ्वीराज कपूर के छालों ने बदला आसिफ का मन – राजस्थान की तपती रेत पर अकबर (पृथ्वीराज कपूर) को नंगे पांव चलना था। जब उनके पैरों में छाले पड़ गए, तो निर्देशक के. आसिफ ने भी अपने जूते उतार दिए। वे पूरी शूटिंग के दौरान कैमरे के पीछे खुद नंगे पांव चले, ताकि एक्टर का दर्द महसूस कर सकें।

5. ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीन का सफर – Mughal-e-Azam मूल रूप से ब्लैक एंड व्हाइट बन रही थी। लेकिन जब आसिफ ने ‘प्यार किया तो डरना क्या’ गाने को रंगीन (Technicolor) शूट किया, तो उन्हें वह इतना पसंद आया कि उन्होंने फिल्म के कई हिस्सों को दोबारा रंगीन शूट करने का फैसला लिया।

9 मार्च 1971 को दिल का दौरा पड़ने से के. आसिफ का निधन हो गया। आज के. आसिफ हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्म Mughal-e-Azam आज भी भव्यता और बेहतरीन निर्देशन की मिसाल मानी जाती है। भारतीय सिनेमा का इतिहास Mughal-e-Azam के जिक्र के बिना हमेशा अधूरा रहेगा।

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