आरोपी के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव वर्मा ने रिमांड का जबरदस्त और जोरदार विरोध किया।

वाराणसी। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद से एक बड़ा अदालती और कानूनी घटनाक्रम सामने आया है, जहां पुलिस की जल्दबाजी और अपूर्ण साक्ष्यों के कारण अदालत ने आरोपी की रिमांड मंजूर करने से साफ इनकार कर दिया। वाराणसी जनपद के थाना जैतपुरा से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल व्यापारिक धोखाधड़ी और चेक बाउंस के मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी की न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत कार्यरत अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (अष्ठम) सौरभ द्विवेदी की अदालत ने आरोपी की पुलिस रिमांड अर्जी को नामंजूर कर दिया है। इसके बाद जैतपुरा पुलिस को कोर्ट से बैरंग ही वापस लौटना पड़ा। यह पूरा मामला थाना जैतपुरा में दर्ज मुअसं. 78/2026 से जुड़ा है, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

क्या है पूरा मामला और क्या हैं आरोप? = यह कानूनी विवाद व्यापारिक भुगतान, वित्तीय अनियमितता और चेक बाउंस से जुड़ा हुआ है। वादी मोहम्मद याकूत (पुत्र अलाउद्दीन) ने विपक्षीगण शाहिद अख्तर, जाहिद अख्तर, खालिद अख्तर, मिलाद अख्तर, नसीम अख्तर, रेशमा परवीन, एखलाक हाजी और अशफाक (समस्त निवासीगण सुग्गा गढ़ही, ओमकालेश्वर थाना आदमपुर) के खिलाफ थाना जैतपुरा में मुकदमा दर्ज कराया था। वादी का आरोप है कि आरोपियों ने व्यापारिक लेनदेन के भुगतान को लेकर उसके साथ धोखाधड़ी की और जो चेक दिए गए, वे बाउंस हो गए। पुलिस ने इस तहरीर के आधार पर बीएनएस की धारा 319(2), 318(4), 338, 336(3), 340(2), 61(2), 352 और 351(2) के तहत अभियोग पंजीकृत किया था।

पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर कोर्ट में किया पेश = मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना जैतपुरा की पुलिस चौकी इंचार्ज सरैया ने त्वरित कार्रवाई करते हुए नामजद आरोपियों में से एक आरोपी जाहिद अख्तर को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस आरोपी की न्यायिक रिमांड हासिल करने के लिए उसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी के क्षेत्राधिकार वाली एसीजेएम (अष्ठम) सौरभ द्विवेदी की अदालत में लेकर पहुंची। पुलिस का मानना था कि मामले की कड़ियों को जोड़ने के लिए आरोपी की रिमांड बेहद जरूरी है।

कोर्ट में आरोपी के वकील की जोरदार बहस और साक्ष्य = जैसे ही पुलिस ने आरोपी जाहिद अख्तर को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी की संबंधित अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया, वैसे ही आरोपी के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव वर्मा ने रिमांड का जबरदस्त और जोरदार विरोध शुरू कर दिया। अधिवक्ता संजीव वर्मा ने पुलिस की थ्योरी को पूरी तरह से खारिज करते हुए अदालत के सामने कुछ ऐसे अकाट्य तकनीकी और कानूनी साक्ष्य प्रस्तुत किए, जिसने पूरे मामले की दिशा बदल दी।

अधिवक्ता संजीव वर्मा ने कोर्ट में मुख्य रूप से निम्नलिखित दलीलें रखीं : बैंक स्लिप का न होना: वादी मुकदमा द्वारा जिन चेकों के बाउंस होने का दावा किया जा रहा है, उनके संबंध में बैंक की कोई भी स्लिप (रसीद) पुलिस ने फाइल में नहीं लगाई है। ऐसे में यह कैसे माना जा सकता है कि उक्त चेकों को कभी बैंक में भुगतान के लिए प्रस्तुत भी किया गया था या नहीं? सेल्फ चेक का पेंच: न्यायालय को बताया गया कि वादी द्वारा दिखाए गए सारे चेक ‘सेल्फ चेक’ (Self Cheques) थे। उन चेकों पर कहीं भी वादी मुकदमा (मोहम्मद याकूत) का नाम तक दर्ज नहीं था। बैंक रिजेक्शन मेमो गायब: वित्तीय धोखाधड़ी के इस मामले में बैंक का कोई रिजेक्शन मेमो या अनादर पत्र (Dishonor Memo) कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि संबंधित खाते की वास्तविक स्थिति क्या है। गलत धाराओं में एफआईआर: बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि एफआईआर में गलत तथ्यों को शामिल कर जबरन अन्य संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है, जबकि यह साबित करने का कोई जरिया नहीं है कि वे चेक वादी को ही जारी किए गए थे।

अदालत का फैसला: पुलिस की रिमांड अर्जी खारिज = मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी के न्यायिक संज्ञान के तहत मामले की सुनवाई कर रहे एसीजेएम (अष्ठम) सौरभ द्विवेदी ने दोनों पक्षों की दलीलों को बेहद ध्यानपूर्वक सुना। बचाव पक्ष के अधिवक्ता संजीव वर्मा द्वारा प्रस्तुत किए गए तकनीकी साक्ष्यों और पुलिस की अधूरी तैयारी को देखते हुए न्यायालय ने आरोपी जाहिद अख्तर की पुलिस रिमांड की अर्जी को पूरी तरह से नामंजूर (खारिज) कर दिया। न्यायालय के इस कड़े रुख के बाद जैतपुरा पुलिस को बिना रिमांड मिले ही कोर्ट परिसर से वापस लौटना पड़ा। कोर्ट का यह फैसला वाराणसी के कानूनी हलकों में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है।

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