अदालत में आरोपी कि ओर से आधिवक्तागण रत्नेश्वर पाण्डेय, श्रीश प्रताप सिंह, हिमांशु त्रिपाठी व शुवेंदु पाण्डेय ने पक्ष रखा।
वाराणसी। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले से एक महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक मामला सामने आया है। न्यायालय सत्र न्यायाधीश, वाराणसी ने बजरडीहा थाने से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी युवक की प्रथम जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने मामले के सभी तथ्यों और पीड़िता के बयान को ध्यान में रखते हुए आरोपी को सशर्त रिहा करने का आदेश दिया है।
यह पूरा मामला प्रेम प्रसंग और उसके बाद अदालती कानूनी दांव-पेच के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसमें आखिरकार न्यायालय सत्र न्यायाधीश, वाराणसी की अदालत ने न्यायोचित रुख अपनाया।
क्या है पूरा मामला? = मामले की शुरुआत 1 अप्रैल 2026 को हुई थी, जब वाराणसी के थाना बजरडीहा अंतर्गत बुल्लेपुर मलदहिया के रहने वाले रोहित सरोज (पुत्र गणेश सरोज) के खिलाफ वादी अशोक कुमार सरोज ने अपनी नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर भगा ले जाने का मुकदमा (अपराध सं0 – 123/2026) दर्ज कराया था। पुलिस ने इस मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 137(2) और 87 के तहत केस दर्ज कर आरोपी रोहित को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया था।
कोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा: पीड़िता के बयान ने बदला रुख = इस मामले में जब न्यायालय सत्र न्यायाधीश, वाराणसी के समक्ष सुनवाई शुरू हुई, तो आरोपी रोहित सरोज के आधिवक्तागण रत्नेश्वर पाण्डेय, श्रीश प्रताप सिंह, हिमांशु त्रिपाठी व शुवेंदु पाण्डेय ने प्रथम जमानत प्रार्थना-पत्र सं0 1932/2026 प्रस्तुत किया। सुनवाई के दौरान पीड़िता के मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए धारा 183 BNSS के बयान ने पूरे मामले का रुख ही बदल दिया।
पीड़िता ने अदालत और मजिस्ट्रेट के सामने साफ शब्दों में कहा :
“मेरी उम्र 19 वर्ष है। स्कूल की मार्कशीट में मेरी उम्र दो साल कम लिखवाई गई थी। मेरा वास्तविक जन्म 17 सितंबर 2007 को हुआ था। मैं और रोहित एक-दूसरे को पसंद करते हैं। जब रोहित मेरी माँ से शादी की बात करने आया था, तो माँ ने उसे फंसाने की धमकी दी थी। इसके बाद हम दोनों ने अपनी मर्जी से 6 अप्रैल 2026 को जौनपुर में शादी कर ली।”
पीड़िता ने यह भी स्पष्ट किया कि उन दोनों के बीच कोई जबरदस्ती नहीं हुई है और वह उच्च न्यायालय के आदेश पर अपनी मर्जी से बयान दर्ज कराने आई है। वह अपनी पूरी जिंदगी रोहित के साथ ही बिताना चाहती है।
सरकारी वकील की दलीलें हुईं कमजोर = सुनवाई के दौरान जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) ने जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि पीड़िता दस्तावेजों के अनुसार नाबालिग है और आरोपी ने गंभीर अपराध किया है। हालांकि, बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि लड़की बालिग है, उसने अपनी स्वेच्छा से फैसला लिया है और दोनों के बीच कोई शारीरिक संबंध भी स्थापित नहीं हुए हैं।
न्यायालय सत्र न्यायाधीश, वाराणसी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों का बारीकी से अवलोकन करने के बाद पाया कि आरोपी को जेल में रखना न्यायोचित नहीं है। न्यायालय सत्र न्यायाधीश, वाराणसी ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी किए बिना रोहित सरोज की जमानत याचिका मंजूर कर ली। अदालत ने आरोपी को निम्नलिखित शर्तों के साथ रिहा करने का आदेश दिया:
- आरोपी को ₹50,000 (पचास हजार रुपये) का व्यक्तिगत बंधपत्र और इतनी ही धनराशि की दो प्रतिभूतियां (जमानतदार) दाखिल करनी होंगी। आरोपी विचारण (ट्रायल) के दौरान कोर्ट का पूरा सहयोग करेगा और हर तारीख पर हाजिर होगा। वह गवाहों को डराने, धमकाने या प्रभावित करने का प्रयास बिल्कुल नहीं करेगा। देश छोड़कर बाहर जाने के लिए न्यायालय की पूर्वानुमति आवश्यक होगी।
अदालत ने यह भी साफ किया है कि यदि आरोपी द्वारा किसी भी शर्त का उल्लंघन किया जाता है, तो अभियोजन पक्ष उसकी जमानत निरस्त कराने के लिए स्वतंत्र होगा। इस फैसले के बाद आरोपी पक्ष और परिजनों को बड़ी राहत मिली है।




