वाराणसी। उत्तर प्रदेश शासन के कड़े निर्देशों के बावजूद वाराणसी नगर निगम में तैनात पशु कल्याण अधिकारी डॉ. संतोष पाल अपनी कुर्सी से मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। शासन द्वारा तबादला किए जाने के हफ्तों बाद भी डॉ. पाल का वाराणसी में जमे रहना अब चर्चा का विषय बन गया है। इसे शासन के आदेशों की खुली अवहेलना और अनुशासनहीनता माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला? (The Controversy) – उत्तर प्रदेश शासन, नगर विकास अनुभाग-4 द्वारा दिनांक 28 अप्रैल 2026 को एक आधिकारिक पत्र जारी किया गया था। इस आदेश के तहत वाराणसी नगर निगम में तैनात पशु कल्याण अधिकारी डॉ. संतोष पाल का स्थानांतरण प्रशासनिक आधार पर नगर निगम, मथुरा-वृन्दावन में रिक्त पद पर कर दिया गया है।
शासनादेश में स्पष्ट रूप से लिखा है कि डॉ. संतोष पाल को “तत्कालिक प्रभाव” से कार्यभार ग्रहण करना है और इसकी सूचना शासन एवं निदेशक, नगर निकाय निदेशालय को देनी है। आदेश में यह भी चेतावनी दी गई है कि आदेशों की अवहेलना को अनुशासनहीनता माना जाएगा और कड़ी कार्यवाही की जाएगी। लेकिन सवाल यह उठता है कि इतना स्पष्ट आदेश होने के बाद भी डॉ. पाल वाराणसी से कार्यमुक्त क्यों नहीं हुए?
पशु तस्करी जैसे गंभीर आरोपों के घेरे में डॉ. संतोष पाल – डॉ. संतोष पाल का विवादों से पुराना नाता रहा है। हाल ही में राष्ट्रीय गौरक्षा वाहिनी के जिलाध्यक्ष अबू हुरैरा और जनराज्य पार्टी के जिलाध्यक्ष ऋषि जायसवाल ने नगर आयुक्त को एक प्रार्थना पत्र सौंपकर डॉ. पाल पर बेहद गंभीर आरोप लगाए थे।
इस शिकायत में आरोप लगाया गया है कि डॉ. संतोष पाल पशु तस्करी (Animal Smuggling) के मामलों में संलिप्त हैं। इन गंभीर आरोपों के बीच उनका तबादला होना और फिर भी वाराणसी में जमे रहना कई संदेह पैदा करता है। आखिर वाराणसी नगर निगम का ऐसा कौन सा “मोह” है जो उन्हें मथुरा जाने से रोक रहा है?
शासनादेश की उड़ रही धज्जियां – प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या डॉ. संतोष पाल के लिए शासन के नियमों की कोई अहमियत नहीं है? आदेश में साफ कहा गया है कि स्थानांतरण प्रशासनिक आधार पर हुआ है, जिसका मतलब है कि विभाग उन्हें वाराणसी में नहीं रखना चाहता। इसके बावजूद कार्यभार न छोड़ना यह दर्शाता है कि अधिकारी खुद को नियमों से ऊपर समझ रहे हैं।
वाराणसी की जनता और सामाजिक संगठन अब यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर कब तक आरोपी अधिकारी को वाराणसी नगर निगम में संरक्षण मिलता रहेगा? क्या शासन अपने ही आदेशों का पालन करवाने में नाकाम साबित होगा? अब देखने वाली बात यह है कि नगर आयुक्त वाराणसी इस पर क्या कार्रवाई करते है?





