वाराणसी: उत्तर प्रदेश की न्यायधानी और बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी की अदालत से इस वक्त की एक बेहद बड़ी कानूनी खबर सामने आ रही है। वाराणसी सीजेएम कोर्ट का बड़ा फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) न्यायालय ने एक महिला द्वारा दायर की गई गंभीर आरोपों वाली याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। यह याचिका पूजा मौर्य नामक महिला की तरफ से स्थानीय पुलिस और कुछ निजी लोगों के खिलाफ दायर की गई थी।

यह पूरा मामला कानूनी गलियारों में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि इसमें पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल उठाए गए थे। हालांकि, अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना रुख साफ कर दिया है।

क्या था पूरा मामला और पूजा मौर्य का आरोप? = याचिकाकर्ता पूजा मौर्य ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत वाराणसी सीजेएम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि भेलूपुर थाना क्षेत्र के कुछ पुलिसकर्मियों ने राहुल उर्फ मटरू, आरती देवी और कुछ अन्य निजी व्यक्तियों के साथ मिलकर एक सोची-समझी साजिश रची।

पूजा मौर्य का दावा था कि इस साजिश के तहत उनके भाई पंकज मौर्य को एक पूरी तरह से फर्जी मामले में फंसाया गया और उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित भी किया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि घटना के समय उनके भाई के बेगुनाह होने के पक्के सबूत जैसे सीसीटीवी (CCTV) फुटेज और मोबाइल लोकेशन डेटा मौजूद थे, लेकिन भेलूपुर पुलिस ने जानबूझकर इन ठोस साक्ष्यों को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने इस मामले में निष्पक्ष जांच और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गुहार लगाई थी।

पुलिस ने अदालत में क्या दी दलील? = पूजा मौर्य के इन गंभीर आरोपों पर पुलिस ने कोर्ट में अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश की और सभी आरोपों को पूरी तरह से निराधार बताया। पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता के भाई पंकज मौर्य के खिलाफ आरती देवी नामक महिला की शिकायत पर 7 जनवरी 2026 को धारा 109(2) और 352 के तहत पहले ही एफआईआर (FIR) दर्ज की जा चुकी थी। पुलिस ने कोर्ट को साफ तौर पर बताया कि इस मामले की जांच के दौरान सभी जरूरी साक्ष्यों को ईमानदारी से संकलित किया गया है और कानून के नियमों का पालन करते हुए चार्जशीट (आरोप पत्र) पहले ही संबंधित न्यायालय में दाखिल की जा चुकी है।

बचाव पक्ष के तर्क और कोर्ट की सख्त टिप्पणी = अदालत में बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक शंकर तिवारी ने मजबूती से अपना पक्ष रखा। दोनों पक्षों की लंबी दलीलों और सबूतों को देखने के बाद वाराणसी सीजेएम कोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में कुछ बेहद महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं को रेखांकित किया : लोक सेवकों को कानूनी संरक्षण: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जिन पुलिसकर्मियों पर आरोप लगाए गए हैं, वे कानूनन लोक सेवक (Public Servants) हैं। उनके खिलाफ किसी भी तरह का अभियोजन (Prosecution) चलाने के लिए कानून के तहत सरकार या सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति (Sanction) लेना अनिवार्य है, जो कि इस मामले में नहीं ली गई थी। संज्ञेय अपराध साबित करने में विफलता: कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह से विफल रही कि कोई ऐसा संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) हुआ है, जिसमें अदालत को सीधे हस्तक्षेप करने की जरूरत पड़े। प्रक्रिया का पालन न होना: कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि चूंकि इस मामले में तय कानूनी प्रक्रिया और अभियोजन स्वीकृति (Sanction) का पालन नहीं किया गया है, इसलिए यह प्रार्थना पत्र आगे की सुनवाई के योग्य ही नहीं है।

निष्कर्ष: क्यों मायने रखता है यह फैसला? = कानूनी जानकारों का मानना है कि वाराणसी सीजेएम कोर्ट का बड़ा फैसला यह साफ करता है कि बिना किसी ठोस आधार और बिना उचित कानूनी प्रक्रिया (जैसे सरकारी अनुमति) के पुलिस अधिकारियों पर दर्ज कराए जाने वाले मुकदमों को अदालतें स्वीकार नहीं करेंगी। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सभी तथ्यों और दलीलों को गहराई से सुनने के बाद पूजा मौर्य की इस याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। भेलूपुर पुलिस के लिए यह राहत की खबर है, वहीं याचिकाकर्ता पक्ष को इस झटके के बाद अब ऊपरी अदालत का रुख करना पड़ सकता है।

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