वाराणसी के वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीनाथ त्रिपाठी के नेतृत्व में इस मुकदमे को मजबूती से लड़ा गया। अदालत में एडवोकेट श्रीनाथ त्रिपाठी के साथ एडवोकेट गुलाम गौश खान और एडवोकेट आशिफ उमर ने आरोपियों के पक्ष में अचूक और दमदार कानूनी तर्क पेश किए।

वाराणसी [ब्यूरो]। उत्तर प्रदेश की सियासत और कानून व्यवस्था से जुड़ी एक बेहद बड़ी खबर वाराणसी से आ रही है। सपा शासन काल के दौरान साल 2005 में हुए चर्चित ज्ञानवापी 2005 बवाल केस में न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। वाराणसी की विशेष MP MLA कोर्ट ने इस मामले में नामजद वरिष्ठ भाजपा नेताओं और मुस्लिम व्यापारियों समेत सभी 14 आरोपियों को ससम्मान दोषमुक्त (बरी) कर दिया है।

न्यायाधीश यजुवेंद्र विक्रम सिंह की अदालत ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों और वकीलों के तर्कों के गहन परीक्षण के बाद यह सुखद फैसला सुनाया। इस फैसले के आते ही आरोपियों के परिजनों और समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई है।

क्या था ज्ञानवापी 2005 बवाल केस? (पूरा मामला) – मामला 2 सितंबर 2005 का है, जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार थी। जुमे की नमाज के दौरान मौलाना बातिन की जांच को लेकर सुरक्षाकर्मियों और स्थानीय लोगों में मामूली कहासुनी हुई थी। देखते ही देखते इस मामूली विवाद ने एक भयंकर बवाल और दंगे का रूप ले लिया।

इस घटना में बड़े पैमाने पर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था और शहर का सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ गया था। स्थानीय लोगों और जानकारों का मानना है कि तत्कालीन सपा शासन में कुछ अराजक तत्वों ने इस बवाल को जानबूझकर हवा दी थी। जब मामला हद से ज्यादा बढ़ गया और शासन-प्रशासन की किरकिरी होने लगी, तो तत्कालीन पुलिस ने अपनी नाकामी छुपाने के लिए बेगुनाह मुस्लिम व्यापारियों और भाजपा नेताओं को नामजद करते हुए संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया था।

21 सालों तक चला सियासी और कानूनी सफर – इस ज्ञानवापी 2005 बवाल केस में भाजपा नेता शंकर गिरी, गुलशन कपूर समेत कुल 7 हिंदुओं और 9 मुस्लिम व्यापारियों को फंसाया गया था (जिनमें से कुछ आरोपियों का इस लंबी अवधि के दौरान निधन भी हो चुका है)।

पिछले 21 वर्षों से इस मुकदमे को लेकर वाराणसी की अदालतों में लंबी बहस, जिरह और बयान दर्ज होने की प्रक्रिया चलती रही। इस दौरान इस केस पर जमकर राजनीति भी हुई। न्याय की आस में मस्जिद इंतजामिया कमेटी और आरोपी पक्षों का एक प्रतिनिधिमंडल मौलाना बातिन के नेतृत्व में तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार और राज्य की सपा सरकार के बड़े नेताओं से मिला था।

नेताओं से मिला था सिर्फ आश्वासन: तत्कालीन यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से मुलाकात कर मुकदमा वापस लेने की गुहार लगाई गई थी। सभी बड़े नेताओं ने उचित सहयोग और मुकदमा वापस लेने का भरोसा तो दिया, लेकिन जमीनी स्तर पर दोनों सरकारों ने कुछ नहीं किया।

जब सरकारों की राजनीतिक मंशा साफ हो गई, तो मस्जिद इंतजामिया कमेटी और आरोपी नेताओं ने राजनीतिक दलों का भरोसा छोड़ दिया और न्यायपालिका की शरण ली। वाराणसी के वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीनाथ त्रिपाठी के नेतृत्व में इस मुकदमे को मजबूती से लड़ा गया।

अदालत में एडवोकेट श्रीनाथ त्रिपाठी के साथ एडवोकेट गुलाम गौश खान और एडवोकेट आशिफ उमर ने आरोपियों के पक्ष में अचूक और दमदार कानूनी तर्क पेश किए। रक्षा दल (Defense Counsel) के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने बिना किसी पुख्ता सबूत के राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव में इन बेगुनाह लोगों को बलि का बकरा बनाया था।

कोर्ट का फैसला: साक्ष्य के अभाव में सब बरी – MP MLA कोर्ट के न्यायाधीश यजुवेंद्र विक्रम सिंह ने दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यानपूर्वक सुना। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ दंगों में शामिल होने या हिंसा भड़काने का कोई भी ठोस और पुख्ता सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा।

न्यायालय ने साक्ष्यों और बयानों के गहन परीक्षण के बाद ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ज्ञानवापी 2005 बवाल केस के सभी 14 जीवित आरोपियों को बाइज्जत बरी (दोषमुक्त) करने का आदेश जारी कर दिया। इस फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि देर से ही सही, लेकिन न्यायपालिका में सच्चाई की जीत होती है।

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