वाराणसी : भगवान शिव की पवित्र नगरी काशी (बनारस) में बृहस्पतिवार को वैचारिक और साहित्यिक चर्चा का एक अनूठा संगम देखने को मिला। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के बनारस केंद्र में युवा लेखक चन्दन कुमार द्वारा लिखित बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘समर्पण: दीनदयाल उपाध्याय पुस्तक का लोकार्पण’ एवं भव्य परिचर्चा संवाद का आयोजन किया गया। इस गरिमामयी समारोह में देश के जाने-माने विद्वानों और विचारकों ने शिरकत की। कार्यक्रम में मुख्य रूप से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े और अपनी शुभकामनाएं दीं।
दीनदयाल उपाध्याय जी की भगवान शंकर से तुलना – ‘समर्पण: दीनदयाल उपाध्याय पुस्तक का लोकार्पण’ के इस विशेष अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद सुप्रसिद्ध वैदिक विद्वान और भारतीय ज्ञान परंपरा के मर्मज्ञ विद्या प्रसाद मिश्रा ने पुस्तक की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ और ‘एकात्म मानववाद’ के दर्शन की गहन व्याख्या करते हुए इसे भारत की मूल आत्मा से जोड़ा।
अपने संबोधन में श्री मिश्रा ने एक बेहद भावुक और वैचारिक तुलना करते हुए दीनदयाल उपाध्याय जी की सहनशक्ति की तुलना साक्षात भगवान शंकर से कर दी। उन्होंने कहा:
“जिस तरह महादेव ने विष पीकर संसार को सिखाया कि सहने से ही व्यक्ति दिव्य बनता है, ठीक उसी तरह दीनदयाल उपाध्याय जी ने भी अपने जीवन के संघर्षों को हंसते-हंसते सहा और अपने कर्म सिद्धांत से देश को दिव्य और भव्य बनाया।”
सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक और प्रज्ञान प्रवाह के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य रामा शीष सिंह ने लेखक की तारीफ करते हुए कहा कि ‘समर्पण: दीनदयाल उपाध्याय पुस्तक का लोकार्पण’ आज के समय में बेहद जरूरी था। उन्होंने कहा कि दीनदयाल जी के विचारों को समझने के लिए ‘समर्पण’ से सटीक कोई दूसरा शब्द हो ही नहीं सकता।
रामा शीष सिंह के अनुसार: जब मन और विचार पूरी तरह से कर्म में ढल जाते हैं, तभी दीनदयाल उपाध्याय जैसी महान आत्मा का अवतरण होता है। एकात्म मानववाद का असली लाभ जनसमूह को तब मिलेगा, जब इसे प्रशासनिक क्षेत्र में कुशलता से लागू किया जाएगा। परिचर्चा के दौरान वक्ताओं ने रेखांकित किया कि दीनदयाल जी ने अपने आचरण, विचार और तपस्वी जीवन से राष्ट्र को एक नई दिशा दी। वे एक ऐसे मौलिक विचारक थे जिन्होंने आधुनिक चुनौतियों का समाधान भारतीय संस्कृति की जड़ों में ढूंढा।
क्यों लिखी गई यह किताब? लेखक चन्दन कुमार ने बताया उद्देश्य – इस विमर्श के अंत में पुस्तक के लेखक चन्दन कुमार ने अपने दिल की बात साझा की। उन्होंने बताया कि इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा उन्हें दीनदयाल जी के जीवन अध्ययन से मिली। लेखक चन्दन कुमार ने प्रमुख बिंदु उठाते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी को यह जानना बेहद जरूरी है कि युवा पीढ़ी के लिए प्रासंगिकता: आज के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में दीनदयाल जी के विचार कितने अनुकूल हैं? संगठन का निर्माण: पार्टी और संगठन के सबसे विकट दिनों में उन्होंने कार्यकर्ताओं की इतनी विशाल फौज कैसे खड़ी की? परमाणु संपन्न भारत: भारत को परमाणु संपन्न राष्ट्र बनाने की नींव में जनसंघ और दीनदयाल जी की क्या दूरगामी भूमिका रही?
चन्दन कुमार ने कहा कि इन्हीं महान आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से ही आज बनारस की धरती पर इस संवाद का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम के समापन पर नागपुर से विशेष रूप से पधारे लेखक चन्दन कुमार के सहयोगी स्वप्निल पाटिल ने सभी अतिथिगणों, विद्वानों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।




