न्यायालय में आरोपियों की तरफ से अधिवक्ता आसिफ उमर व शादाब अहमद ने पक्ष रखा।
वाराणसी। उत्तर प्रदेश की न्याय नगरी काशी से इस वक्त की एक बड़ी खबर सामने आ रही है। जनपद के चौक थाना क्षेत्र से जुड़े एक पुराने आपराधिक मामले में वाराणसी कोर्ट का फैसला आ गया है। विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (उ0प्र0 मंदिर सेवा) कृष्ण कुमार सप्तम की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी महफूज इमरान उर्फ बाबू भेजा सहित पांचों नामजद अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए बाइज्जत बरी (दोषमुक्त) कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। कानून के स्थापित सिद्धांतों के तहत संदेह का लाभ देते हुए कोर्ट ने सभी को दोषमुक्त करने का आदेश जारी किया। न्यायालय में आरोपियों की तरफ से अधिवक्ता आसिफ उमर व शादाब अहमद ने पक्ष रखा।
क्या था पूरा मामला? – यह पूरा मामला साल 2018 का है। चौक थाने में वादी मुकदमा सैय्दद शाहबाज आरफीन ने अभियुक्तगण महफूज इमरान उर्फ बाबू भेजा, अहमद रजा उर्फ बाबू, सलमान फैसल खान, जिया सिद्दीकी और जिशान खान के खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई थी। 14 जून 2018 को हुई इस घटना के बाद पुलिस ने मु०अ०सं०-119/2018 के तहत भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 324, 504 और 506 के अंतर्गत आरोप पत्र (चार्जशीट) विचारण के लिए कोर्ट में पेश किया था।
गवाहों के बयानों में विरोधाभास बना बरी होने का आधार – इस मामले में वाराणसी कोर्ट का फैसला मुख्य रूप से गवाहों के बयानों में आए विरोधाभास और उनके मुकर जाने (होस्टाइल होने) पर आधारित रहा। अभियोजन पक्ष की ओर से तीन मुख्य साक्षी कोर्ट में पेश किए गए थे:
- सैय्दद शाहबाज आरफीन (वादी मुकदमा)
- सैयद शादाब आरफीन
- मोहम्मद इस्लाम खान (पी०डब्लू०-03)
अदालती कार्यवाही के दौरान जब गवाहों से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) की गई, तो अभियोजन का पूरा कथानक ताश के पत्तों की तरह ढह गया। पी०डब्लू०-02 और पी०डब्लू०-03 ने अपनी मुख्य परीक्षा और जिरह में पुलिस की कहानी का समर्थन ही नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि इन गवाहों के साक्ष्य बेहद संदिग्ध और विरोधाभासी हैं, जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का दिया गया हवाला – वाराणसी कोर्ट का फैसला सुनाते हुए मजिस्ट्रेट कृष्ण कुमार सप्तम ने देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के दो बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों (Precedents) का जिक्र किया। एच. पी. एडमिनिस्ट्रेशन बनाम ओम प्रकाश (AIR 1972 SC 975): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी थी कि फौजदारी कानून में प्रत्येक संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) हमेशा अभियुक्त को मिलना चाहिए। हरेन्द्र बनाम आसाम राज्य (AIR 2008 SC 2467): इस नजीर में कोर्ट ने माना था कि अभियोजन पक्ष को अपना केस हर हाल में ‘संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) साबित करना होता है।
कोर्ट का अंतिम आदेश और शर्तें – साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि साक्ष्य के अभाव में आरोपियों पर लगे आरोप सिद्ध नहीं होते। 26 मई 2026 को आए वाराणसी कोर्ट का फैसला के तहत आदेश दिया गया कि:
“अभियुक्तगण महफूज इमरान उर्फ बाबू भेजा, अहमद रजा उर्फ बाबू, सलमान फैसल खान, जिया सिद्दीकी व जिशान खान को चौक थाने के मुकदमे से दोषमुक्त किया जाता है। चूंकि अभियुक्त अभी जमानत पर हैं, इसलिए उनके जमानतनामा निरस्त कर प्रतिभूगण को दायित्वों से मुक्त किया जाता है।”
हालाँकि, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 437-A के प्रावधानों के तहत कोर्ट ने भविष्य की सुरक्षा के तौर पर सभी बरी हुए व्यक्तियों को आदेश दिया है कि वे अगले 6 महीनों के लिए 20,000 रुपये का एक पर्सनल बॉन्ड (P.B.) और उतनी ही धनराशि का एक प्रतिभू (जमानतदार) कोर्ट में दाखिल करें, ताकि उच्च न्यायालय में अपील होने की स्थिति में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके। इसके बाद पत्रावली को दफ्तर दाखिल कर दिया गया।





